बिलासपुर में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

✍️ भागीरथी यादव

 

राजस्व अधिकारियों की सीमा तय, ग्रेच्युटी-पीएफ पर केवल सिविल कोर्ट का अधिकार

बिलासपुर। शिक्षिका की मौत के बाद खुद को जैविक संतान बताकर सरकारी लाभ हासिल करने के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर या तहसीलदार जैसे राजस्व अधिकारी केवल परिवार पेंशन (कंट्रीब्यूटरी फैमिली पेंशन) के उद्देश्य से ही आश्रित प्रमाण पत्र जारी कर सकते हैं। ग्रेच्युटी, पीएफ और अन्य वित्तीय लाभों के लिए उत्तराधिकार तय करने का अधिकार केवल सक्षम सिविल कोर्ट को है।

मामला बिलासपुर जिले के बिल्हा स्थित रहंगी मिडिल स्कूल में पदस्थ उच्च वर्ग की शिक्षिका शमशाद बेगम से जुड़ा है। उनकी मृत्यु के बाद काजोल खान ने खुद को मृतका की जैविक पुत्री बताते हुए कलेक्टर कार्यालय में आवेदन दिया। इस पर तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर ने जून 2014 में उसे एकमात्र कानूनी वारिस घोषित करते हुए प्रमाण पत्र जारी कर दिया। इसी प्रमाण पत्र के आधार पर काजोल खान को पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य शासकीय लाभ प्राप्त हो गए।

इस फैसले को मृतका के भाइयों मोहम्मद इखलाक खान और मोहम्मद इकबाल खान ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने याचिका में बताया कि शमशाद बेगम अविवाहित थीं, ऐसे में उनके निधन के बाद मिलने वाले सभी शासकीय लाभों पर उनका अधिकार बनता है।

मामले की सुनवाई जस्टिस राकेश मोहन पाण्डेय की एकलपीठ में हुई। कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 के नियम 47(14) और राज्य सरकार के 17 दिसंबर 2003 के सर्कुलर का विस्तृत विश्लेषण किया। कोर्ट ने पाया कि राजस्व अधिकारियों को केवल परिवार पेंशन के लिए आश्रितों की पहचान करने का सीमित अधिकार है। इसके विपरीत, ग्रेच्युटी, पीएफ जैसे अन्य वित्तीय लाभों के लिए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के तहत सिविल कोर्ट से प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में डिप्टी कलेक्टर ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर प्रमाण पत्र जारी किया, जो कानूनन गलत है। कोर्ट का यह फैसला न सिर्फ इस प्रकरण में बल्कि भविष्य में ऐसे सभी मामलों के लिए एक मजबूत नजीर माना जा रहा है

 

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