
✍️ भागीरथी यादव
जनकपुर ब्लॉक के सरकारी विद्यालय में शिक्षा व्यवस्था की पोल खुली
एमसीबी।
देश की सबसे बड़ी शिक्षा व्यवस्था होने का दावा करने वाली सरकारी प्रणाली की जमीनी सच्चाई एक बार फिर सामने आई है। छत्तीसगढ़ के मनेन्द्रगढ़–चिरमिरी–भरतपुर जिले के जनकपुर ब्लॉक स्थित ग्राम पंचायत कमर्जी के शासकीय प्राथमिक विद्यालय में हालात इतने बदतर हैं कि कागज़ों में तैनात शिक्षक स्कूल से नदारद हैं और बच्चों की पढ़ाई एक चपरासी के भरोसे छोड़ दी गई है।

विद्यालय में कुल 68 छात्र अध्ययनरत हैं। शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड के मुताबिक यहां एक प्रधान पाठक और दो सहायक शिक्षक पदस्थ हैं। लेकिन जब दोपहर लगभग 2 बजे विद्यालय का जायजा लिया गया, तो सच्चाई चौंकाने वाली थी।
खुला स्कूल, भटकते बच्चे, खाली कक्षाएं
विद्यालय भवन खुला मिला, बच्चे परिसर में इधर-उधर घूमते नजर आए, लेकिन कक्षाओं में पढ़ाने वाला कोई शिक्षक मौजूद नहीं था। ग्रामीणों ने बताया कि तीनों शिक्षक बिना किसी सूचना और अनुमति के अनुपस्थित हैं। न समय तय है, न जवाबदेही—बस स्कूल चल रहा है कागज़ों में।
68 बच्चों का भविष्य एक चपरासी के हवाले
सबसे गंभीर और चिंताजनक तथ्य यह सामने आया कि पूरे विद्यालय की जिम्मेदारी एक चपरासी के भरोसे छोड़ दी गई है। यह व्यक्ति पढ़ाने के लिए नियुक्त नहीं है, फिर भी वही बच्चों की निगरानी और विद्यालय संचालन संभाल रहा है। यह स्थिति न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ खुला खिलवाड़ भी है।
शिक्षा का अधिकार या मज़ाक?
यह मामला केवल शिक्षकों की गैरहाजिरी का नहीं, बल्कि शिक्षा के अधिकार अधिनियम के खुले उल्लंघन का है। जब शिक्षक स्कूल से गायब रहते हैं, तो सिर्फ कक्षाएं ही खाली नहीं होतीं—बच्चों का भरोसा, उनका उत्साह और उनके सपने भी धीरे-धीरे टूटने लगते हैं।
दावों और ज़मीनी सच्चाई में गहरी खाई
सरकार एक ओर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्कूलों के उन्नयन के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर ऐसे विद्यालय इस बात की गवाही दे रहे हैं कि कई सरकारी स्कूल महज़ कागज़ी औपचारिकता बनकर रह गए हैं।
अब सवालों के घेरे में शिक्षा विभाग
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
क्या शिक्षा विभाग इस गंभीर लापरवाही पर कार्रवाई करेगा?
क्या बिना सूचना अनुपस्थित शिक्षकों पर निलंबन की गाज गिरेगी?
या फिर यह मामला भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दबा दिया जाएगा?
यह प्रकरण केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, जो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों की शिक्षा के साथ रोज़ाना समझौता कर रही है।






