
✍️ भागीरथी यादव
बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शिक्षा व्यवस्था से जुड़े दो अहम मामलों में सक्रिय भूमिका निभाते हुए एक ओर जहां बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया है, वहीं दूसरी ओर एक शिक्षक के अधिकारों की रक्षा करते हुए न्यायिक संतुलन का स्पष्ट संदेश दिया है।
मिड-डे मील मामला: दूषित भोजन पर हाईकोर्ट का स्वतः संज्ञान
बिलासपुर में मिड-डे मील खाने से 25 बच्चों के बीमार पड़ने के गंभीर मामले में हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने इस घटना को बेहद संवेदनशील मानते हुए राज्य के मुख्य सचिव से विस्तृत जवाब तलब किया है।
जांच में यह स्पष्ट हुआ कि बच्चों को दूषित भोजन परोसा गया था। इस लापरवाही के चलते तीन शिक्षकों को निलंबित कर दिया गया है। कोर्ट के निर्देश पर प्रभावित 25 बच्चों के परिजनों को प्रति बच्चा 5,000 रुपये मुआवजा दिया गया, जिसका वितरण 19 जनवरी 2026 को किया गया।
इतना ही नहीं, भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए हाईकोर्ट ने सेंट्रल किचन सिस्टम लागू करने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही यह भी आदेश दिया गया कि मिड-डे मील वितरण स्थल को बच्चों के अनुकूल, स्वच्छ और सुरक्षित बनाया जाए।
कोर्ट ने साफ कहा कि बच्चों के स्वास्थ्य के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता और प्रशासन की जवाबदेही तय की जाएगी।
फर्जी दस्तावेज मामला: बर्खास्त शिक्षक को हाईकोर्ट से राहत
दूसरी ओर, बिलासपुर में ही फर्जी दस्तावेज पेश करने के आरोप में बर्खास्त किए गए शिक्षक ईश्वरी निर्मलकर को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। ईश्वरी निर्मलकर सहित छह याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने बर्खास्तगी आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है।
ईश्वरी निर्मलकर की नियुक्ति वर्ष 2007 में शिक्षाकर्मी वर्ग-3 के रूप में हुई थी।
2009 में सेवा नियमित
2018 में स्कूल शिक्षा विभाग में एब्जॉर्प्शन
2023 में प्राइमरी स्कूल हेडमास्टर के पद पर पदोन्नति
हालांकि, उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज है, लेकिन उसका ट्रायल अभी लंबित है। इसके बावजूद जिला शिक्षा अधिकारी, धमतरी द्वारा 6 जनवरी 2026 को उन्हें बर्खास्त कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगाते हुए यह संकेत दिया कि जब तक दोष सिद्ध न हो, तब तक कर्मचारी के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
न्यायालय का स्पष्ट संदेश
इन दोनों मामलों में हाईकोर्ट का रुख यह दर्शाता है कि
बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सर्वोच्च प्राथमिकता है
वहीं शिक्षकों और कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है
किसी भी निर्णय में उचित प्रक्रिया और संवैधानिक संतुलन अनिवार्य है
हाईकोर्ट की यह सक्रियता न केवल शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि प्रशासन के लिए भी एक कड़ा संदेश है कि लापरवाही और मनमानी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।








