
कोरबा। (ज्ञान शंकर तिवारी)
सरकारी दावों और हकीकत के बीच की खाई शनिवार को जिला मुख्यालय स्थित 20 बिस्तर ई.सी.आर.पी. (ECRP) वार्ड में साफ नजर आई। जहां सुबह के 9:40 बजने के बाद भी अस्पताल का दरवाजा तो खुला था, लेकिन भीतर की कुर्सियां और मेज खाली पड़ी थीं। न तो कोई डॉक्टर ड्यूटी पर तैनात था और न ही नर्सिंग स्टाफ का अता-पता था।
बेड खाली, उम्मीदें टूटीं
शनिवार की सुबह इलाज की आस लेकर कई मरीज और उनके परिजन दूर-दराज से इस वार्ड में पहुंचे थे। वार्ड के भीतर बेड, पर्दे और मशीनें तो अपनी जगह पर दुरुस्त थीं, लेकिन उन्हें संचालित करने वाला कोई ‘जिम्मेदार’ मौजूद नहीं था। काफी देर तक इंतजार करने के बाद जब कोई भी स्वास्थ्य कर्मी नजर नहीं आया, तो मरीजों को मजबूरन बिना इलाज कराए वापस लौटना पड़ा।
लापरवाही की इंतहा: समय का कोई पाबंद नहीं
नियमों के मुताबिक सुबह 8 बजे से ही ओपीडी और वार्डों में हलचल शुरू हो जानी चाहिए, लेकिन 9:40 बजे तक स्टाफ की अनुपस्थिति जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
“हम इलाज के लिए सुबह से खड़े हैं, लेकिन यहां कोई सुनने वाला नहीं है। अगर इमरजेंसी में किसी की जान पर बन आए, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा?”
— एक पीड़ित परिजन का दर्द
कार्रवाई की मांग: क्या जागेगा प्रशासन?
स्थानीय नागरिकों और मरीजों के परिजनों ने इस मामले को लेकर भारी आक्रोश जताया है। नागरिकों का कहना है कि बायोमेट्रिक अटेंडेंस और सख्त नियमों के दावों के बीच कर्मचारी ड्यूटी से गायब रहकर मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। ग्रामीणों और पीड़ितों ने स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों से मांग की है कि लापरवाह स्टाफ की पहचान कर उन पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
“अस्पताल खुला, जिम्मेदार नदारद” — शनिवार सुबह 9:40 बजे कोरबा स्थित ई.सी.आर.पी. वार्ड का दृश्य, जहां स्टाफ की गैरमौजूदगी के कारण सन्नाटा पसरा रहा और मरीज भटकते नजर आए।







