
एमसीबी/ मनेंद्रगढ़ शहर के कई वार्ड इन दिनों दहशत में हैं। मादा भालू अपने दो शावकों के साथ रिहायशी इलाकों में लगातार देखी जा रही है, लेकिन वन विभाग की उदासीनता ने लोगों की चिंता और बढ़ा दी है। हालात यह हैं कि लोग शाम ढलते ही घरों से बाहर निकलने से डरने लगे हैं, जबकि प्रशासनिक तंत्र मानो गहरी नींद में है।
शहरवासियों का कहना है कि यह पहली बार नहीं जब भालू मानव बस्ती तक पहुँचे हों। कई बार शिकायतें, आवेदन और जनप्रतिनिधियों के माध्यम से ज्ञापन दिए गए, मगर फील्ड एक्शन के नाम पर विभाग केवल आश्वासन ही देता रहा। लोगों का आरोप है कि जवाबदेही तय करने में लगातार विफलता ने वन विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार डीएफओ मनीष कश्यप के कार्यकाल में ऐसे कई मामले सामने आए, लेकिन हर बार कार्रवाई ठंडे बस्ते में चली गई। जनदर्शन जैसे मंच, जहां जनता की परेशानी सुनी जानी चाहिए, अब महज औपचारिकता बनकर रह गए हैं। हालात यह बताते हैं कि निगरानी और वन्यजीव नियंत्रण के लिए बनाई गई व्यवस्थाएँ जमीन पर दिखाई ही नहीं दे रहीं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विभाग के पास महीनों पहले से भालू की आवाजाही की जानकारी थी, तो न उसे पकड़ा गया, न ही कोई प्रभावी सुरक्षा योजना लागू की गई। क्या शहरवासियों की सुरक्षा का महत्व इतना कम हो चुका है कि खतरे को सामने देखकर भी प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा है?
विशेषज्ञों का कहना है कि वन्यजीवों के लगातार रिहायशी इलाकों में पहुंचने का मतलब है कि निगरानी तंत्र कमजोर है, और विभाग को तुरंत फील्ड टीम बढ़ाकर संवेदनशील इलाकों में गश्त शुरू करनी चाहिए।
अब समय आ गया है कि वन विभाग अपनी चुप्पी तोड़े और स्थिति को हल्के में लेने के बजाय ठोस कदम उठाए। जवाबदेही तय किए बिना यह समस्या खत्म नहीं होगी, और यह ढिलाई जनता के प्रति गंभीर लापरवाही मानी जाएगी।





