
मनेंद्रगढ़। एशिया का सबसे बड़ा गोंडवाना मैरिन फॉसिल्स पार्क, जो कभी भारत की वैज्ञानिक और ऐतिहासिक शान माना जाता था, आज प्रशासनिक लापरवाही और विभागीय निष्क्रियता की भेंट चढ़ चुका है। वन मंडलाधिकारी मनेंद्रगढ़ की उपेक्षा और वन विभाग की उदासीनता ने इस अनमोल धरोहर को धीरे-धीरे बर्बादी की ओर धकेल दिया है।
करीब 29 करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्म, जो धरती के प्राचीन समुद्री जीवन के अनमोल प्रमाण हैं, आज धूल में दबे पड़े हैं। संरक्षण और पर्यटन विकास के लिए बनाई गई करोड़ों की योजनाएं अब केवल कागज़ों और पोस्टरों तक सीमित रह गई हैं।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि विभाग ने योजनाओं के नाम पर भारी खर्च दिखाया, लेकिन मौके पर न तो कोई वास्तविक कार्य हुआ, न कोई संरक्षण दिखता है।
लोहे की जालियां टूटी पड़ी हैं, सूचना पट्ट गायब हैं और जीवाश्म खुले आसमान के नीचे उजड़ रहे हैं।
वन विभाग के दावे—“संरक्षण, सौंदर्यीकरण और पर्यटन को बढ़ावा”—सिर्फ प्रेस विज्ञप्तियों का हिस्सा बनकर रह गए हैं। जमीनी सच्चाई यह है कि यह एशिया का गौरवशाली पार्क अब अव्यवस्था और उपेक्षा का प्रतीक बन चुका है।
प्रश्न यह है —
क्या वन विभाग केवल प्रचार और योजनाओं के कागज़ी आंकड़े दिखाने के लिए है?
करोड़ों रुपये की योजनाओं का हिसाब कौन देगा?
और सबसे अहम — वन मंडलाधिकारी मनीष कश्यप जवाबदेही से कब तक बचते रहेंगे?
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि शीघ्र ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह वैज्ञानिक धरोहर सदा के लिए नष्ट हो जाएगी।
अब वक्त है कि विभाग झूठे दावों और औपचारिक बैठकों से आगे बढ़कर इस पार्क के संरक्षण को वास्तविक रूप दे। वरना, गोंडवाना मैरिन फॉसिल्स पार्क आने वाली पीढ़ियों के लिए सिर्फ इतिहास की किताबों में “खोया हुआ अवसर” बनकर रह जाएगा।






