
मनेन्द्रगढ़/ खड़गवां वन विभाग द्वारा अवैध अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बाद लगाए जा रहे आरोपों पर बड़ा खुलासा हुआ है। मीडिया टीम और स्थानीय लोगों की पड़ताल में सामने आया कि जिन्हें “बेघर आदिवासी” बताया जा रहा था, उनके पास पहले से ही अन्य पंचायतों में घर और जमीन मौजूद है।
वन विभाग ने राजेन्द्र प्रधान, सुलेमान और रामप्रसाद के अवैध निर्माण तोड़े थे। विभाग ने तीन-तीन बार नोटिस जारी किए थे, जिसकी रिसीविंग भी मौजूद है। बिना नोटिस कार्रवाई के आरोप पूरी तरह झूठे पाए गए।

सोशल मीडिया पर जिस करीमन के “पट्टे के घर” को तोड़ने की बात फैलाई गई, वह भी गलत निकली। पट्टे की जमीन पर कोई निर्माण था ही नहीं। सुशीला नाम की महिला ने बताया कि करीमन ने उन्हें वन भूमि पर घर बनाने के लिए जगह दी थी, जबकि वह जगह वन विभाग की है।
स्थानीय निवासियों और रतनपुर पंचायत के सरपंच ने भी साफ किया कि जिन लोगों के ढांचे तोड़े गए वे रतनपुर के मूल निवासी नहीं हैं, न ही उनके नाम पंचायत में पीएम आवास स्वीकृत है। बल्कि एक अवैध रूप से दूसरे गांव के नाम पर स्वीकृत पीएम आवास को रतनपुर में बनाकर बेचा जा रहा था।
जांच में यह भी सामने आया कि इनमें से एक व्यक्ति कई जगह अवैध मकान बनाकर बेचने के धंधे में लगा है। विभाग का कहना है कि बार-बार चेतावनी के बाद भी अवैध कब्जा नहीं हटाया गया, इसलिए कार्रवाई अनिवार्य थी। कई और स्थानों पर जल्द कार्रवाई की जाएगी।
कुल मिलाकर—अवैध निर्माण को राजनीतिक रंग देने की कोशिश बेनकाब हुई, और वन विभाग की कार्रवाई पूरी तरह वैध व नोटिस प्रक्रिया के बाद की गई साबित हुई।






