जनता का टैक्स, जवाबदेही नदारद

✍️ भागीरथी यादव

 

डीएफओ मनीष कश्यप सवालों से क्यों बच रहे हैं?

 

एमसीबी। जिले के वनमंडलाधिकारी (डीएफओ) मनीष कश्यप इन दिनों लगातार सुर्खियों में हैं। लेकिन यह सुर्खियाँ जवाबदेही की हैं या फिर प्रशंसा की आड़ में छुपे सवालों की—यही सबसे बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। भालू हमलों की बढ़ती घटनाएँ, अवैध वृक्ष कटाई, लकड़ी तस्करी और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोपों के बीच वन विभाग की कार्यप्रणाली पर अब जनता खुलकर सवाल उठा रही है।

 

लोकतंत्र में आलोचना अस्वाभाविक नहीं है, लेकिन चिंता का विषय यह है कि सवालों के जवाब देने के बजाय उनसे बचने की प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। जैसे ही डीएफओ किसी विवाद के घेरे में आते हैं, वैसे ही सोशल मीडिया और कुछ चुनिंदा माध्यमों में अचानक प्रशंसा से भरी खबरों की बाढ़ आ जाती है। यह संयोग है या सुनियोजित छवि निर्माण—यह सवाल भी अब चर्चा में है।

 

‘महुआ बचाओ’ अभियान हो या 29.3 करोड़ वर्ष पुराने गोंडवाना मरीन फॉसिल पार्क की पहचान—उपलब्धियों का प्रचार तो जोर-शोर से होता है, लेकिन इन योजनाओं पर खर्च हुई सरकारी राशि, ठेके और चयन प्रक्रिया, निगरानी तंत्र और जमीनी परिणामों पर कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आती। यदि सब कुछ पारदर्शी और सफल है, तो फिर स्वतंत्र पत्रकारों के सवालों से दूरी क्यों?

 

प्रेस वार्ताओं से बचना और सभी मीडिया संस्थानों को एक मंच पर बुलाकर खुली जानकारी साझा न करना—क्या यह प्रशासनिक आत्मविश्वास की कमी नहीं दर्शाता? यह याद रखना जरूरी है कि ये किसी एक अधिकारी की व्यक्तिगत उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि जनता के टैक्स से संचालित सरकारी योजनाएँ हैं। ऐसे में सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार है।

 

इसी बीच एक और गंभीर मामला सामने आया है। जून माह में भरतपुर–सोनहत के पूर्व विधायक एवं राज्य मंत्री दर्जा प्राप्त नेता गुलाब कमरो ने कुंवारपुर, बहरासी और बिहारपुर रेंज में वर्षों से चल रही अवैध लकड़ी कटाई को लेकर सनसनीखेज आरोप लगाए। उनका दावा है कि वन विभाग की मिलीभगत से बाहरी माफिया साल और सागौन जैसी बहुमूल्य प्रजातियों की खुलेआम कटाई कर रहे हैं। कटी लकड़ियाँ चोरी-छिपे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में ऊँचे दामों पर बेची जा रही हैं।

 

पूर्व विधायक ने इस संबंध में मुख्यमंत्री, वन मंत्री और कलेक्टर को लिखित शिकायत देकर स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच की मांग की थी, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अब तक ठोस कार्रवाई शून्य नजर आ रही है।

 

कागजों में मनचाही खबरें छपवाकर छवि जरूर चमकाई जा सकती है, लेकिन जमीनी सच्चाई से मुँह मोड़ना प्रशासनिक ईमानदारी पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। अभी भी समय है। यदि डीएफओ मनीष कश्यप के कार्य वास्तव में निष्पक्ष, नियमसम्मत और मजबूत हैं, तो उन्हें प्रेस और जनता के सवालों का खुलकर सामना करना चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र में प्रशंसा से कहीं अधिक मूल्य जवाबदेही और पारदर्शिता का होता है।

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