
✍️ भागीरथी यादव
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने आत्महत्या के लिए उकसाने (धारा 306 आईपीसी) के एक मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई चार वर्ष की सजा को निरस्त करते हुए आरोपी को बरी कर दिया है। जस्टिस रजनी दुबे की एकल पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आत्महत्या के लिए उकसाने के आवश्यक और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा।
यह मामला जांजगीर-चांपा जिले के बलौदा थाना क्षेत्र का है। बसंत कुमार सतनामी पर आरोप था कि उसकी पत्नी टिकैतिन बाई ने विवाह के लगभग चार वर्ष बाद कथित प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या कर ली। द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश, एफटीसी जांजगीर ने 31 जुलाई 2007 को आरोपी को धारा 306 के तहत दोषी ठहराते हुए चार वर्ष के सश्रम कारावास और 500 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।
निचली अदालत के फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण स्पष्ट नहीं बताया गया था। चिकित्सक ने गवाही में स्वीकार किया कि मौत उल्टी-दस्त से भी हो सकती है, जबकि एस्फिक्सिया की संभावना से भी इनकार नहीं किया गया। मामले में एफएसएल रिपोर्ट भी प्रस्तुत नहीं की गई।
अदालत ने यह भी नोट किया कि गवाहों के बयान परस्पर विरोधाभासी थे। कुछ ने जहर सेवन, कुछ ने शराब पीने, तो कुछ ने उल्टी-दस्त से मृत्यु होने की बात कही। ऐसे विरोधाभासों के चलते मृत्यु का कारण स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हो सका।
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच सामान्य विवाद या पारिवारिक कलह मात्र से धारा 306 के तहत उकसाने का अपराध सिद्ध नहीं होता, जब तक कि स्पष्ट आपराधिक मंशा और प्रत्यक्ष उकसावे का प्रमाण न हो। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि दोषसिद्धि के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं।
अंततः कोर्ट ने माना कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि मृतका की मृत्यु आत्महत्या थी या आरोपी ने उसे आत्महत्या के लिए उकसाया। इस आधार पर ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि को टिकाऊ नहीं मानते हुए आरोपी को बरी कर दिया गया।







