
✍️ भागीरथी यादव
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवादों और गुजारा भत्ते को लेकर एक बड़ा और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पत्नी बिना किसी वाजिब और ठोस कारण के अपने पति और ससुराल से अलग रहने का निर्णय लेती है, तो वह पति से भरण-पोषण भत्ता पाने की हकदार नहीं होगी।
बिलासपुर फैमिली कोर्ट के आदेश पर हाई कोर्ट की मुहर
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की खंडपीठ ने बिलासपुर के प्रवीण कुमार वेदुला की पत्नी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया। याचिकाकर्ता (पत्नी) ने निचली अदालत (कुटुंब न्यायालय) के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे गुजारा भत्ता देने से इनकार कर दिया गया था। हाई कोर्ट ने निचली अदालत के तर्क को सही पाया और उसमें किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
दांपत्य अधिकारों की बहाली का अवसर ठुकराना पड़ा भारी
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कुछ महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं को रेखांकित किया:
धारा 09 का संदर्भ: पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 09 (दांपत्य संबंधों की पुनर्स्थापना) के तहत पत्नी को साथ रखने के लिए याचिका लगाई थी। कोर्ट ने कहा कि जब पत्नी के पास घर वापस लौटने का विकल्प था, तो उसने बिना वजह अलग रहना चुना।
कानूनी उल्लंघन: न्यायालय ने CRPC की धारा 125(4) का हवाला देते हुए कहा कि यदि पत्नी बिना पर्याप्त कारण के पति के साथ रहने से इनकार करती है, तो वह भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती।
झूठे आरोपों और कानूनी लड़ाई का अंत
पत्नी द्वारा पति पर की गई कानूनी कार्रवाई के प्रयास भी विफल रहे। अधिवक्ता नेल्सन पन्ना ने बताया कि पत्नी ने FIR दर्ज कराने के लिए मजिस्ट्रेट कोर्ट और फिर सेशन कोर्ट में आवेदन लगाए थे, जो पहले ही खारिज हो चुके थे।
कोर्ट की टिप्पणी: व्यवहार भी होगा न्याय का आधार
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट शब्दों में कहा:
“कुटुंब न्यायालय के आदेश में कोई अवैधता या त्रुटि नहीं है। जब पत्नी बिना किसी उचित आधार के अलग रह रही हो, तो ऐसी स्थिति में भरण-पोषण का आदेश देना कानून के सिद्धांतों के विपरीत होगा।”







