
✍️ भागीरथी यादव
दिल्ली हाईकोर्ट ने इंडिगो एयरलाइन में जारी संकट पर तीखी नाराजगी जताते हुए इसे न सिर्फ यात्रियों की परेशानी, बल्कि पूरे देश की आर्थिक गतिविधियों पर गहरा आघात बताया है। अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा कि लाखों यात्री एयरपोर्ट पर घंटों फंसे रहे, जो किसी भी आधुनिक और विकसित हो रहे देश की हवाई परिवहन व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस मनमोहन और जस्टिस तुषार राव गेडेला की बेंच ने केंद्र सरकार और डीजीसीए से सख्त लहजे में पूछा कि जब उड़ानों की भारी रद्दीकरण की आशंका पहले से थी, तो समय रहते प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए गए?
कोर्ट ने पायलटों की ड्यूटी टाइमिंग से जुड़े नए नियम, जिन्हें 1 जून 2024 से लागू होना था, पर भी चिंता जताई। अदालत ने पूछा—
“जब नियम पहले से तय थे, तो इंडिगो ने पायलटों की पर्याप्त भर्ती क्यों नहीं की? इस तरह की प्रशासनिक लापरवाही से आज हजारों यात्रियों को क्यों भुगतना पड़ रहा है?”
बेंच ने यह भी पूछा कि एयरपोर्ट पर फंसे यात्रियों को राहत, भोजन, सहायता और जानकारी देने के लिए क्या कदम उठाए गए। साथ ही एयरलाइन स्टाफ के व्यवहार को लेकर भी कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर असंतोष जताया।
सबसे गंभीर टिप्पणी तब आई जब अदालत ने कहा कि संकट के इस समय में अन्य एयरलाइंस “अवसरवाद” दिखा रही हैं। कोर्ट ने बताया कि सामान्यतः 4–5 हजार में मिलने वाले टिकट 30 हजार रुपये तक बेचे जा रहे हैं। कोर्ट ने पूछा—
“सरकार ने इस खुले शोषण को रोकने के लिए अब तक क्या किया?”
अधूरी तैयारी के साथ दाखिल की गई याचिका पर अदालत ने नाराजगी जताई, लेकिन जनहित को देखते हुए खुद मामले को गंभीरता से सुनने का फैसला किया।
हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और डीजीसीए को सभी सवालों के विस्तृत, तथ्यात्मक और संतोषजनक जवाब जल्द दाखिल करने का निर्देश दिया है।
मामले की अगली सुनवाई निकट भविष्य में निर्धारित की जाएगी, और अदालत ने संकेत दिए हैं कि इस बार जवाबदेही तय किए बिना वह पीछे नहीं हटेगी।








