
✍️ भागीरथी यादव
एमसीबी। कागज़ों में 220 बिस्तरीय दर्जा प्राप्त सिविल चिकित्सालय मनेन्द्रगढ़ की जमीनी हकीकत स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल रही है। अस्पताल में पदस्थ कई अनुबंधित चिकित्सकों की लंबी अनुपस्थिति ने नियमित उपचार सेवाओं से लेकर इमरजेंसी ड्यूटी तक को प्रभावित कर दिया है। परिणामस्वरूप मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पा रहा और व्यवस्था सवालों के घेरे में है।
अधीक्षक बनाम सीएमएचओ: विरोधाभासी दावे
अस्पताल अधीक्षक डॉ. स्वप्निल तिवारी ने डॉक्टरों की कमी और उससे उत्पन्न प्रशासनिक कठिनाइयों को लेकर जिला मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को पत्र लिखा है। वहीं, जिला मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय, एमसीबी की ओर से स्थिति सामान्य बताई जा रही है। बताया जा रहा है कि सीएमएचओ स्तर पर डॉक्टरों की संख्या को लेकर स्पष्ट जानकारी तक उपलब्ध नहीं है। यह विरोधाभास स्वयं में प्रशासनिक समन्वय की कमी को उजागर करता है।
मरीज भुगत रहे अव्यवस्था का खामियाजा
डॉक्टरों की कमी का सीधा असर मरीजों पर पड़ रहा है। ओपीडी सीमित, इमरजेंसी पर दबाव और गंभीर मामलों में रेफरल की संख्या बढ़ना अब सामान्य हो गया है। कई मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है, जिससे आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है।
मशीन है, सेवा नहीं: सोनोग्राफी बनी प्रतीक्षा का नाम
अस्पताल में सोनोग्राफी मशीन उपलब्ध है, लेकिन नियमित जांच सुविधा नहीं मिल पा रही। सीमित दिनों में ही जांच होने से गर्भवती महिलाओं और दूरदराज से आने वाले मरीजों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है। अक्सर अगली तारीख देकर मरीजों को लौटा दिया जाता है या निजी केंद्रों का सहारा लेने को मजबूर किया जाता है। यह स्थिति संसाधनों के उपयोग और निगरानी तंत्र पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
बड़ा दर्जा, कमजोर व्यवस्था
नगर अस्पताल से जिला अस्पताल का दर्जा मिलने के बावजूद सुविधाओं का विस्तार अपेक्षित स्तर तक नहीं हो सका। केवल भवन और बिस्तर संख्या बढ़ाने से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावी नहीं होतीं; इसके लिए पर्याप्त डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता अनिवार्य है।
जवाबदेही तय करने की मांग
एक ओर अधीक्षक द्वारा समस्या उजागर की जा रही है, दूसरी ओर प्रशासनिक स्तर पर इनकार—ऐसी स्थिति में आम जनता भ्रमित है। सवाल यह है कि यदि जिला मुख्यालय के अस्पताल का यह हाल है, तो ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति कैसी होगी?
अब आवश्यकता केवल आश्वासनों की नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई और पारदर्शिता की है। स्वास्थ्य सेवाएं अधिकार हैं, सुविधा नहीं। मनेन्द्रगढ़ के मरीज इंतजार में हैं—क्या व्यवस्था जागेगी या हालात यूं ही कागज़ों तक सीमित रहेंगे?






