
✍️ भागीरथी यादव
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण पारिवारिक विवाद में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि शादी से पहले गंभीर चिकित्सकीय तथ्य छिपाना वैवाहिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। अदालत ने पत्नी की याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा पति को दिया गया तलाक का आदेश बरकरार रखा है, हालांकि पत्नी के भविष्य को सुरक्षित रखते हुए पति को 5 लाख रुपये स्थायी भरण-पोषण देने का निर्देश भी दिया है।
मामला कवर्धा जिले से जुड़ा है, जहां पति-पत्नी की शादी 5 जून 2015 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। शादी के बाद पत्नी ने पति को बताया कि उसे पीरियड्स नहीं आ रहे हैं, जिसे पति ने गर्भावस्था समझा। जब मेडिकल जांच कराई गई तो चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि पत्नी को पिछले 10 वर्षों से मासिक धर्म नहीं आ रहा था और उसके गर्भाशय से जुड़ी समस्या के कारण संतान उत्पत्ति में गंभीर कठिनाई थी।
पति का आरोप था कि पत्नी ने यह अहम तथ्य शादी से पहले जानबूझकर छिपाया। जब उससे इसका कारण पूछा गया तो उसने स्वीकार किया कि यदि पहले सच बताया होता तो शादी नहीं होती। इस खुलासे से पति को गहरा मानसिक आघात पहुंचा। इसके बाद पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता के आधार पर फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दायर की।
फैमिली कोर्ट, कवर्धा ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पति के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित कर दी। इस फैसले को चुनौती देते हुए पत्नी ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। पत्नी का तर्क था कि उसकी चिकित्सकीय स्थिति स्थायी नहीं थी और इलाज के बाद वह गर्भधारण के लिए फिट हो गई थी।
हालांकि, हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने माना कि शादी के समय ऐसी गंभीर चिकित्सकीय जानकारी छिपाना विश्वासघात और मानसिक क्रूरता के समान है। अदालत ने फैमिली कोर्ट के निर्णय को सही ठहराते हुए पत्नी की याचिका खारिज कर दी।
इसके साथ ही कोर्ट ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए पत्नी के भरण-पोषण का भी ध्यान रखा और पति को आदेश दिया कि वह पत्नी को स्थायी गुजारा भत्ता के रूप में 5 लाख रुपये का भुगतान करे।
यह फैसला न केवल पारदर्शिता और विश्वास की वैवाहिक अहमियत को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि सच छिपाकर किया गया विवाह कानून की नजर में टिकाऊ नहीं है।








