हाईकोर्ट का अहम फैसला: सौतेली मां के प्यार की कोई गारंटी नहीं, सिर्फ पैसा कस्टडी का आधार नहीं

✍️ भागीरथी यादव 

 

बिलासपुर।

बच्चों की कस्टडी और संरक्षण को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा शामिल थे, ने साफ कहा कि “बच्चे को सौतेली मां से वही प्यार, सुरक्षा और भावनात्मक माहौल मिलेगा—इसकी कोई गारंटी नहीं होती। मां का प्यार सर्वोपरि है और केवल बेहतर आर्थिक स्थिति के आधार पर पिता को बच्चे की कस्टडी नहीं दी जा सकती।”

कोर्ट ने दूसरी महिला के साथ रह रहे एक पिता की अपील को खारिज करते हुए उसके 7 वर्षीय बेटे की कस्टडी मां को सौंपने का फैसला बरकरार रखा।

क्या है पूरा मामला

बेमेतरा जिले के कोड़वा गांव निवासी लक्ष्मीकांत की शादी वर्ष 2013 में हुई थी। दंपति के दो बेटे हैं। कुछ वर्षों बाद पति-पत्नी के बीच लगातार विवाद होने लगे, जिसके चलते मामला अदालत तक पहुंचा। लक्ष्मीकांत ने अपने बड़े बेटे (7 वर्ष) की कस्टडी की मांग करते हुए पहले फैमिली कोर्ट बेमेतरा में याचिका दायर की थी।

फैमिली कोर्ट ने बच्चे के हित को सर्वोपरि मानते हुए पिता की याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील की।

पत्नी का आरोप: बिना तलाक दूसरी महिला के साथ रह रहा पति

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पत्नी ने आरोप लगाया कि उसका पति बिना तलाक लिए एक अन्य महिला के साथ पति-पत्नी की तरह रह रहा है। क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान खुद पति ने स्वीकार किया कि उसका दूसरी महिला से प्रेम संबंध है और उसने मंदिर में उससे शादी भी की है।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा—

बच्चे का कल्याण केवल आर्थिक संसाधनों से नहीं मापा जा सकता

मानसिक, भावनात्मक और नैतिक विकास सबसे अहम है

यह मान लेना कि सौतेली मां बच्चे को वही स्नेह दे पाएगी, उचित नहीं

पिता का दूसरी महिला के साथ रहना बच्चे के भविष्य के लिए अनुकूल नहीं

कोर्ट ने पिता की यह दलील भी खारिज कर दी कि वह आर्थिक रूप से सक्षम है और पत्नी के पास आय का साधन नहीं है।

कस्टडी में सबसे ऊपर बच्चे का हित

हाईकोर्ट ने संबंधित कानूनों का हवाला देते हुए कहा कि कस्टडी मामलों में माता-पिता के अधिकार नहीं, बल्कि बच्चे का सर्वोत्तम हित सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसी आधार पर कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए पिता की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया।

समाज के लिए संदेश

यह फैसला उन मामलों में एक नजीर के रूप में देखा जा रहा है, जहां पिता केवल आर्थिक मजबूती के आधार पर कस्टडी का दावा करते हैं। हाईकोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि मां का स्नेह, सुरक्षा और भावनात्मक जुड़ाव बच्चे के भविष्य की बुनियाद है।

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