कोरबा दर्री प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना पर संकट: विद्युत कंपनी की नई नीति से स्थानीय ठेकेदारों में रोष, पलायन की आशंका

✍️ भागीरथी यादव

 

 कोरबा दर्री    11-04-2026

कोरबा। देश के ऊर्जा हब के रूप में पहचान रखने वाला कोरबा जिला, जो वर्षों से प्रदेश सहित कई राज्यों को रोशन करता आया है, अब अपनी ही व्यवस्था को लेकर सवालों के घेरे में है। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत कंपनी की नई कार्यप्रणाली ने स्थानीय ठेकेदारों और श्रमिकों के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।

एचटीपीपी, कोरबा पूर्व, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (डीएसपीएम) और अटल बिहारी वाजपेयी ताप विद्युत संयंत्र, मड़वा में कार्यरत ठेकेदारों ने संयुक्त रूप से आयोजित पत्रकार वार्ता में अपनी पीड़ा जाहिर की। कांट्रेक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष धनंजय सिंह समेत अन्य पदाधिकारियों ने बताया कि कंपनी अब 5 से 10 करोड़ रुपए तक की बड़ी-बड़ी निविदाएं जारी कर रही है, जिससे स्थानीय ठेकेदार पूरी तरह प्रतिस्पर्धा से बाहर होते जा रहे हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस नीति का सीधा लाभ बाहरी बड़ी कंपनियों को मिल रहा है, जो अपने साथ बाहरी श्रमिकों को भी लाती हैं। इससे न केवल स्थानीय ठेकेदारों का रोजगार प्रभावित हो रहा है, बल्कि उनके अधीन कार्यरत करीब 5000 ठेका श्रमिकों के सामने भी रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

पत्रकार वार्ता के दौरान अध्यक्ष धनंजय सिंह ने स्पष्ट कहा –

“राज्य विद्युत कंपनी की वर्तमान नीति पूरी तरह से स्थानीय ठेकेदारों के खिलाफ नजर आ रही है। 5 से 10 करोड़ रुपए तक की बड़ी निविदाएं जारी कर हमें प्रतिस्पर्धा से बाहर किया जा रहा है। इससे न केवल स्थानीय ठेकेदार प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि हमारे साथ जुड़े हजारों श्रमिकों के सामने भी रोजगार का संकट खड़ा हो गया है।

बड़ी कंपनियां बाहर से श्रमिक लाकर काम करा रही हैं, जिससे स्थानीय लोगों के साथ अन्याय हो रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो कोरबा जैसे रोजगार देने वाले जिले में पलायन बढ़ना तय है।

हम शासन और उद्योग मंत्री से मांग करते हैं कि स्थानीय ठेकेदारों और श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए तत्काल ठोस निर्णय लिया जाए, अन्यथा हमें आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ेगा।”

एसोसिएशन ने चेतावनी दी कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो कोरबा जैसा रोजगार देने वाला जिला जल्द ही पलायन का केंद्र बन सकता है। स्थानीय श्रमिकों के साथ अन्याय और रोजगार छिनने की स्थिति से सामाजिक-आर्थिक असंतुलन बढ़ने की आशंका जताई गई है।

हालांकि, उद्योग मंत्री ने इस मामले में समाधान का आश्वासन दिया है, लेकिन विद्युत कंपनी के जिम्मेदार अधिकारी फिलहाल चुप्पी साधे हुए हैं, जिससे ठेकेदारों में नाराजगी और असंतोष लगातार बढ़ रहा है।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या स्थानीय रोजगार और श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए नीति में बदलाव होगा, या फिर कोरबा में पलायन की स्थिति हकीकत बन जाएगी?