
ज्ञान शंकर तिवारी
कोरबा जिले में खदान परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों का आक्रोश फिर सतह पर है। भू-विस्थापित कोयला कर्मचारी एसोसिएशन के जिला अध्यक्ष संतोष पटेल ने केंद्रीय कोयला मंत्री को ज्ञापन सौंपते हुए आरोप लगाया है कि दीपका, गेवरा और कुसमुंडा परियोजनाओं में प्रभावित परिवारों को अब तक वादा किया गया वैकल्पिक रोजगार नहीं मिला।
ज्ञापन में उल्लेख है कि 10 नवंबर 2024 को दीपका परियोजना में कार्यबंदी के दौरान जिला प्रशासन, कंपनी प्रबंधन और श्रमिक संगठनों के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ था। इस समझौते में भू-विस्थापित परिवारों को प्राथमिकता के आधार पर रोजगार देने का आश्वासन दिया गया था। संघ का आरोप है कि यह आश्वासन अब तक कागज़ों से बाहर नहीं आ पाया है।
“स्थानीयों की अनदेखी, बाहरी को प्राथमिकता”
संतोष पटेल ने आरोप लगाया कि स्थानीय बेरोजगार युवाओं को दरकिनार कर बाहरी लोगों को काम दिया जा रहा है। साथ ही ठेका कंपनियों पर मजदूरी भुगतान में अनियमितता और रेट निर्धारण में पारदर्शिता की कमी के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। कुछ क्षेत्रों में महिलाओं द्वारा परियोजना कार्यालयों के सामने विरोध प्रदर्शन की घटनाएं भी सामने आई हैं, जो बढ़ते असंतोष का संकेत हैं।
30–40 गांव प्रभावित, परिवार आर्थिक संकट में
संघ का दावा है कि लगभग 30 से 40 गांव विभिन्न परियोजनाओं से प्रभावित हैं। भूमि अधिग्रहण के समय स्थायी रोजगार और पुनर्वास का भरोसा दिया गया था, लेकिन आज कई परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। बच्चों की पढ़ाई, इलाज और रोजमर्रा का खर्च उठाना तक मुश्किल हो गया है।
प्रमुख मांगें
कोयला मंत्री को सौंपे गए ज्ञापन में संघ ने मांग की है—
प्रभावित परिवारों को तत्काल रोजगार दिया जाए।
त्रिपक्षीय समझौते का पालन सुनिश्चित किया जाए।
ठेका कंपनियों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता देने का स्पष्ट आदेश जारी किया जाए।
संतोष पटेल ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो धरना, प्रदर्शन और कामबंद आंदोलन किया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी कंपनी प्रबंधन और प्रशासन की होगी।
अब निगाहें केंद्र सरकार और मंत्रालय के फैसले पर टिकी हैं। सवाल यह है कि खदानों की समृद्धि में अपनी जमीन गंवाने वाले परिवारों को न्याय कब मिलेगा?






