मंत्री का बयान बना संवैधानिक मर्यादा और सादगी का प्रतीक

✍️ भागीरथी यादव

 

 

रायपुर – लखन लाल देवांगन के हालिया विधानसभा वक्तव्य ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा को जन्म दिया है। सदन में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मंत्री का दायित्व नीतिगत निर्णय लेना है, जबकि उन नीतियों का क्रियान्वयन प्रशासनिक अधिकारियों — कलेक्टर, एसपी, आईएएस और आईपीएस अधिकारियों — के माध्यम से होता है। उनके इस बयान को प्रशासनिक गरिमा और संवैधानिक समझ का प्रतीक माना जा रहा है।

कुछ दिन पूर्व भूपेश बघेल ने सदन में टिप्पणी करते हुए कहा था कि “जो मंत्री अधिकारियों को आदेश नहीं दे सकता, वह किस बात का मंत्री।” इस बयान के जवाब में उद्योग मंत्री का संतुलित दृष्टिकोण राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।

नीति और क्रियान्वयन की स्पष्ट रेखा

उद्योग मंत्री ने अपने वक्तव्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि मंत्री नीतियां तय करते हैं, जबकि जमीनी अमल प्रशासनिक ढांचा सुनिश्चित करता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारी कठिन परीक्षा और प्रशिक्षण के बाद शासन व्यवस्था का संचालन करते हैं। ऐसे में जनप्रतिनिधि और अधिकारी आपसी समन्वय और संवाद से जनता के हित में कार्य करते हैं।

भाजपा सरकार की कार्यशैली

भाजपा सरकार में अधिकारियों के प्रति सम्मान और संवाद की परंपरा को रेखांकित करते हुए मंत्री ने कहा कि योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए टकराव नहीं, बल्कि तालमेल आवश्यक है। शासन की मंशा आमजन तक तभी पहुंचती है जब राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक अमला एक दिशा में काम करे।

राजनीतिक इतिहास के संदर्भ

राजनीतिक इतिहास में प्रशासनिक व्यवहार को लेकर कई विवाद सामने आए हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कार्यकाल में उनके पुत्र अमित जोगी से जुड़े कुछ प्रकरणों पर राजनीतिक विवाद खड़े हुए थे।

मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह के कार्यकाल के दौरान भी प्रशासनिक निर्णयों को लेकर चर्चाएं हुई थीं।

इन उदाहरणों को सामने रखते हुए राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजनीतिक संस्कृति का सीधा प्रभाव प्रशासनिक वातावरण पर पड़ता है।

जनमत का संदेश

हालिया चुनाव परिणामों को भी राजनीतिक संस्कृति से जोड़कर देखा जा रहा है। पूर्व उद्योग मंत्री को लगभग 27 हजार मतों से मिली हार को कई लोग मतदाताओं का स्पष्ट संदेश मान रहे हैं कि जनता संयमित और सम्मानजनक राजनीति को प्राथमिकता देती है।

विधानसभा में दिया गया उद्योग मंत्री का वक्तव्य कमजोरी नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा और प्रशासनिक गरिमा के सम्मान का संकेत है। लोकतंत्र में मंत्री और अधिकारी आदेशात्मक अहंकार से नहीं, बल्कि नीति, संवाद और समन्वय से कार्य करते हैं — यही स्वस्थ शासन व्यवस्था की आधारशिला है।

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