
✍️ भागीरथी यादव
नई दिल्ली – भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक नया ड्राफ्ट सर्कुलर जारी किया है, जिसमें भारतीय कंपनियों को घरेलू या विदेशी फर्मों में पूरा या नियंत्रित स्टेक खरीदने के लिए बैंकों द्वारा लोन उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रखा गया है। केंद्रीय बैंक ने इन मानदंडों को 1 अप्रैल 2026 से लागू करने का सुझाव दिया है।
सर्कुलर के अनुसार, बैंकों द्वारा दिया जाने वाला यह लोन शॉर्ट-टर्म फाइनेंशियल रीस्ट्रक्चरिंग के बजाय लॉन्ग-टर्म स्ट्रैटेजिक इन्वेस्टमेंट का हिस्सा होगा। अधिग्रहण करने वाली कंपनियों को लिस्टेड होना आवश्यक है और उनकी नेट वर्थ मजबूत होनी चाहिए। इसके लिए पिछले तीन वर्षों का प्रॉफिट रिकॉर्ड भी देखा जाएगा।
आरबीआई ने बताया कि अधिग्रहण मूल्य का अधिकतम 70 प्रतिशत बैंक फंड कर सकता है, जबकि कम से कम 30 प्रतिशत हिस्सा अधिग्रहण करने वाली कंपनी को अपने धन से इक्विटी के रूप में जुटाना होगा। साथ ही, किसी बैंक का कुल एक्सपोजर उसके टियर-I कैपिटल के 10 प्रतिशत तक ही सीमित रहेगा।
सर्कुलर में कहा गया है कि बैंक सीधे एक्वायरिंग कंपनी को लोन दे सकते हैं या इस कंपनी द्वारा टारगेट एंटिटी को खरीदने के लिए स्थापित स्टेप-डाउन स्पेशल पर्पस व्हीकल (SPV) को फंडिंग प्रदान कर सकते हैं।
केंद्रीय बैंक ने यह भी स्पष्ट किया है कि लोन देने वाले बैंकों के पास एक्विजिशन फाइनेंस पर एक पॉलिसी होनी चाहिए, जिसमें उधार लेने वालों की योग्यता, सिक्योरिटी, रिस्क मैनेजमेंट, मार्जिन, मॉनिटरिंग टर्म्स और अन्य शर्तों का विवरण शामिल हो।
साथ ही, बैंकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि एक्वायरिंग कंपनी और एसपीवी नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां या अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड जैसे वित्तीय इंटरमीडियरी न हों। इसके अलावा, एक्वायर करने वाली और टारगेट कंपनी आपस में रिलेटेड पार्टी नहीं होनी चाहिए। अधिग्रहण मूल्य बाजार नियामक सेबी के नियमों के तहत तय किया जाएगा और क्रेडिट असेस्मेंट के लिए दोनों कंपनियों की संयुक्त बैलेंसशीट का मूल्यांकन किया जाएगा।








