**SECL दीपका पर संविधान की अनदेखी के आरोप

ज्ञान शंकर तिवारी 

 

भू-विस्थापितों का फूटा आक्रोश — “कोल बेरिंग एक्ट नहीं, मनमानी से चल रहा प्रशासन”**

कोरबा।

छत्तीसगढ़ की ऊर्जा राजधानी कहे जाने वाले कोरबा जिले में विकास की चकाचौंध के पीछे भू-विस्थापितों का गहरा दर्द अब सड़कों पर उतर आया है। साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के दीपका क्षेत्र प्रबंधन पर भारतीय संविधान, कोल बेरिंग एक्ट और पेसा कानून की खुली अवहेलना के गंभीर आरोप लगे हैं। भू-विस्थापितों और मूल निवासियों का कहना है कि दीपका परियोजना में कानून नहीं, बल्कि “तानाशाही सोच” से फैसले थोपे जा रहे हैं।

ग्रामीणों ने दो टूक कहा है — “हमारे लिए संविधान सर्वोपरि है और न्यायालय ही हमारे मंदिर हैं, लेकिन SECL प्रबंधन इसे मानने को तैयार नहीं।”

अनुसूचित क्षेत्र में कानून की अनदेखी का आरोप

कोरबा जिला भारतीय संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत पूर्ण रूप से अनुसूचित क्षेत्र घोषित है। यहां पेसा कानून (PESA Act, 1996) लागू होता है, जिसके तहत जल-जंगल-जमीन पर ग्राम सभा को निर्णायक अधिकार प्राप्त हैं।

आरोप है कि दीपका विस्तार परियोजना में ग्राम सभाओं की सहमति के बिना ही भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई, जो सीधे-सीधे संविधान और पेसा कानून का उल्लंघन है।

आंदोलन की आग को हवा देने वाले मुख्य मुद्दे

भेदभाव का आरोप

भू-विस्थापितों का कहना है कि SECL प्रबंधन SC-ST-OBC वर्ग के साथ भेदभावपूर्ण रवैया अपना रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि यहां कोल बेरिंग एक्ट 1957 की जगह “हिटलरशाही” और “मनमानी नीति” से फैसले लिए जा रहे हैं।

भूमि अधिग्रहण और मुआवजा विवाद

कोल बेरिंग एक्ट के अनुसार यदि किसी गांव की अधिकांश जमीन अधिग्रहित हो जाती है, तो शेष भूमि भी अनुपयोगी हो जाती है, ऐसी स्थिति में पूरी जमीन का मुआवजा, नौकरी और पुनर्वास अनिवार्य है।

ग्रामीणों का दावा है कि SECL इन प्रावधानों को जानबूझकर नजरअंदाज कर रहा है।

खनन के बाद जमीन वापसी का नियम ठंडे बस्ते में

नियमों के मुताबिक खनन के बाद जमीन को 5 फीट उपजाऊ मिट्टी डालकर किसानों को लौटाना होता है, लेकिन धरातल पर इसका पालन कहीं नजर नहीं आता।

1991-92 पुनर्वास नीति लागू करने की मांग

प्रदर्शनकारियों की स्पष्ट मांग है कि 1991-92 की पुनर्वास नीति के तहत हर खाताधारी और पट्टाधारी को नौकरी दी जाए, चाहे उसकी जमीन एक-दो डिसमिल ही क्यों न हो।

हरदी बाजार भू-अधिग्रहण बना टकराव का केंद्र

दीपका विस्तार परियोजना के तहत ग्राम हरदी बाजार में जारी भूमि अधिग्रहण को ग्रामीणों ने पूरी तरह अवैध बताया है।

प्रशासन द्वारा निर्माण रोकने के लिए जारी नोटिस को ग्रामीणों ने सिरे से खारिज कर दिया है।

ग्रामीणों का कहना है कि —

धारा 3-4 के प्रकाशन से पहले कोई त्रिपक्षीय बैठक नहीं हुई

वर्ष 2002 से 2022 तक की पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया शून्य और अवैध है

मुआवजा 2025-26 की नई गाइडलाइन के अनुसार दिया जाए

गाइडलाइन रेट्स का तुलनात्मक आंकड़ा

2019-20:

बिना कॉलम मकान ₹662

कॉलम वाला ₹828 प्रति वर्गफुट

2024-25:

बिना कॉलम ₹1150

कॉलम वाला ₹1750

2025-26 (वर्तमान):

RCC मकान ₹1150

स्कूल/दुकान ₹1700

गोदाम ₹1550 प्रति वर्गफुट

ग्रामीणों का कहना है कि इन्हीं दरों पर मुआवजा मिलना चाहिए।

ग्रामीणों की दो टूक चेतावनी (बाइट)

“जब दीपका प्रोजेक्ट की ब्लास्टिंग से हमारे घर जर्जर हो रहे हैं, तो मरम्मत पर रोक क्यों? जब अधिग्रहण ही अवैध है, तो नोटिस भी अवैध है। हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे।”

‘हड़प नीति’ का आरोप, कानूनी लड़ाई की तैयारी

समाजसेवी मनीराम भारती ने SECL की कार्यप्रणाली की तुलना अंग्रेजों की ‘हड़प नीति’ से करते हुए इसे असंवैधानिक बताया है।

मनीराम भारती का बयान:

“SECL विस्तार के नाम पर किसानों की संपत्ति हड़प रहा है। यदि संविधान और कानून के अनुसार मुआवजा व बसाहट नहीं दी गई, तो माननीय न्यायालय इस अवैध अधिग्रहण को ध्वस्त कर देगा।”

इस संबंध में मांग पत्र और विरोध की प्रतियां

📌 कलेक्टर कोरबा

📌 एसडीएम पाली

📌 तहसीलदार हरदी बाजार

📌 SECL दीपका क्षेत्र के महाप्रबंधक

को सौंप दी गई हैं।

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