शिक्षा के मंदिर में श्रम का शोषण

ज्ञान शंकर तिवारी 

 

 

पाली ब्लॉक के शासकीय स्कूल में बच्चों से कराया जा रहा काम, शिक्षकों की लापरवाही कैमरे में कैद

पाली।

ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था पहले से ही कई चुनौतियों से जूझ रही है, लेकिन जब स्कूल—जो बच्चों के भविष्य की नींव होते हैं—वहीं उनके अधिकारों का हनन होने लगे, तो यह पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसा ही एक शर्मनाक मामला पाली विकासखंड के ग्राम सफलवा के आश्रित मोहल्ला राहा में संचालित शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला से सामने आया है, जहाँ शिक्षा के नाम पर बच्चों से श्रमिक कार्य कराए जाने का आरोप सामने आया है।

पढ़ाई छोड़, बाल्टी और झाड़ू थामते बच्चे

मिली जानकारी के अनुसार विद्यालय में पदस्थ एक शिक्षिका रोज़ की तरह दोपहर लगभग 3 बजे बिना किसी पूर्व सूचना के विद्यालय छोड़कर चली गईं। वहीं स्कूल में मौजूद दूसरे शिक्षक द्वारा बच्चों से बाल्टी में पानी भरवाना, कक्षा की साफ-सफाई कराना जैसे कार्य कराए जा रहे थे। यह पूरा दृश्य पाली के मीडिया प्रतिनिधि द्वारा मोबाइल कैमरे में रिकॉर्ड किया गया, जिससे मामले की गंभीरता और स्पष्ट हो गई।

सवालों से बचते शिक्षक, मीडिया से अभद्र व्यवहार

जब इस पूरे मामले पर संबंधित शिक्षक से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय मीडिया से अभद्र भाषा में बातचीत की। “स्कूल में कैसे आ गए”, “किसने अनुमति दी” जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए न केवल जवाबदेही से बचने की कोशिश की गई, बल्कि पत्रकारिता की मर्यादा को भी ठेस पहुंचाई गई।

बाल अधिकारों का खुला उल्लंघन

यह घटना केवल एक विद्यालय की नहीं, बल्कि ग्रामीण इलाकों में शिक्षा व्यवस्था की कड़वी सच्चाई को उजागर करती है। जिन बच्चों के हाथों में किताब और कलम होनी चाहिए, वे स्कूल में श्रम करने को मजबूर हैं। यह स्थिति बाल अधिकारों और शिक्षा के अधिकार अधिनियम—दोनों का सीधा उल्लंघन है।

निगरानी व्यवस्था पर उठे सवाल

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था आखिर कहां है? क्या इस तरह की गतिविधियां पहले भी होती रही हैं? और क्या संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी थी?

अब विभागीय कार्रवाई की कसौटी

अब देखना यह होगा कि शिक्षा विभाग इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और दोषी शिक्षकों के खिलाफ क्या ठोस कार्रवाई की जाती है। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो “शिक्षा का मंदिर” कहलाने वाले विद्यालयों की गरिमा लगातार धूमिल होती चली जाएगी।