अखिलेश उप्पल बीजापुर – जहां एक समय लाल आतंक की गूंज सुनाई देती थी, वहीं अब कारीगरी की आवाजें सुनाई देने लगी हैं। कभी बंदूक थामने वाले हाथ अब ईंट-गारा जोड़ रहे हैं। बीजापुर जिले में आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की ज़िंदगी अब तेज़ी से बदल रही है। सरकार की पुनर्वास नीति और कौशल विकास कार्यक्रमों ने उन्हें एक नई पहचान दी है। एक शिल्पी, चालक, कारीगर और सबसे अहम, एक नागरिक के रूप में। राज्य सरकार की पुनर्वास नीति के तहत इन युवाओं को न सिर्फ संरक्षण दिया जा रहा है, बल्कि उन्हें समाज में सम्मानजनक जीवन जीने के लिए तैयार भी किया जा रहा है। आत्मसमर्पित नक्सलियों को अब भवन निर्माण के लिए राजमिस्त्री का प्रशिक्षण, आधुनिक खेती के लिए ट्रैक्टर और जेसीबी चलाने की ट्रेनिंग दी जा रही है।

पूर्व महिला नक्सली भी अब सिलाई- कढ़ाई सीखकर अपने जीवन को नए सिरे से गढ़ रही हैं। उनके चेहरों पर अब डर नहीं, आत्मविश्वास की चमक है। प्रशिक्षको का मानना है कि शिक्षा के बिना आत्मनिर्भरता अधूरी है, इसीलिए हर दिन कुछ घंटे इन्हें पढ़ाई और सामान्य ज्ञान की कक्षाएं भी दी जाती हैं।
कलेक्टर संबित मिश्रा ने बताया कि आत्मसमर्पण करने वालों को पहले सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस लाइन में रखा जाता है, फिर उन्हें पुनर्वास केंद्रों में भेजा जाता है, जहां उन्हें आवासीय सुविधा के साथ कौशल प्रशिक्षण दिया जाता है। विकास की इस मुहिम को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए संवेदनशील गांवों में सुरक्षा कैंप भी स्थापित किए गए हैं। साथ ही प्रधानमंत्री आवास योजना, स्कूल, आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य केंद्र जैसी मूलभूत सुविधाओं को वहां तेज़ी से शुरू किया गया है।
अब वही हाथ जो कभी जंगलों में छिपे रहते थे, आज जेसीबी चला रहे हैं। जिन आँखों में हिंसा पलती थी, अब वो भविष्य के सपनों से रोशन हैं। बस्तर की धरती अब बारूद की नहीं, बदलाव की खुशबू बिखेर रही है।






