
✍️ भागीरथी यादव
Inside Story – छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग एक समय देश के सबसे संवेदनशील और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में गिना जाता था। बीजापुर जैसे जिले में पोस्टिंग को लेकर अधिकारियों के बीच हिचक साफ दिखाई देती थी। लेकिन इसी दौर में एक निर्णय ने न सिर्फ हालात बदले, बल्कि एक नई रणनीति को जन्म दिया।
यह कहानी है रतन लाल डांगी आईपीएस की।
जमीनी दौर की तस्वीर
घने जंगल, सीमित संसाधन और चारों ओर खतरा—यह वही दौर था जब बस्तर में काम करना किसी चुनौती से कम नहीं था।
बीजापुर: जब पद था, लेकिन जाने वाला कोई नहीं
मई 2006…
उस समय रतनलाल डांगी कांकेर में एसडीओपी के रूप में पदस्थ थे और अवकाश पर राजस्थान गए हुए थे। इसी बीच उनका आदेश बीजापुर में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (Additional SP) के रूप में जारी हुआ।
हालात ऐसे थे कि बीजापुर में एसपी के पद पर नियुक्त एक अधिकारी ने डर के कारण ज्वाइन करने से इनकार कर दिया और अपना आदेश निरस्त करवा लिया। दूसरे अधिकारी को नियुक्त किया गया, लेकिन उन्होंने भी ज्वाइन नहीं किया, जिसके चलते उन्हें निलंबन का सामना करना पड़ा।
इसी परिस्थिति में जब डांगी को तत्काल बीजापुर पहुंचकर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक का कार्यभार संभालने के लिए कहा गया, तब उन्होंने एक अलग प्रस्ताव रखा—

जब बीजापुर में कोई एसपी बनने को तैयार नहीं है, तो मुझे ही यह जिम्मेदारी दे दी जाए।
बताया जाता है कि सरकार ने उसी दिन आदेश में संशोधन करते हुए उन्हें सीधे पुलिस अधीक्षक (SP) नियुक्त कर दिया।
4 मई 2006 को उन्होंने एसडीओपी से सीधे बीजापुर के एसपी के रूप में कार्यभार संभाला।
सलवा जुडूम का दौर और सीमित संसाधन
यह वही समय था जब सलवा जुडूम आंदोलन चल रहा था और पूरे क्षेत्र में हिंसा का माहौल था। सुरक्षा व्यवस्था बेहद सीमित थी—केवल दो बटालियन के सहारे पूरा जिला संचालित हो रहा था।
यहां तक कि कई स्थानों पर नियमित एसडीओपी की जगह सहायक सेनानी को जिम्मेदारी दी गई थी।
“खूनी सड़क” से “ब्लैक रोड” तक
बीजापुर से गंगालूर तक का मार्ग “खूनी सड़क” के नाम से जाना जाता था।
इसी रास्ते को बदलने का काम शुरू हुआ—
पुलिस की मदद से सड़क निर्माण
छत्तीसगढ़ की पहली सीसी सड़कों में शामिल
बीआरओ के सहयोग से बंद पड़े कार्यों को फिर शुरू करना
यह मॉडल इस सोच पर आधारित था—
जहां सड़क पहुंचेगी, वहां शासन और विकास दोनों पहुंचेंगे
सड़क और सुरक्षा
ऑपरेशन और परिणाम
कठिन परिस्थितियों के बावजूद ऑपरेशनल स्तर पर महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए—
पहले वर्ष में 38 नक्सलियों को मार गिराया
दूसरे वर्ष में फिर से 34 नक्सलियों को मार गिराया
इन्हें उस समय नक्सल विरोधी अभियानों की बड़ी उपलब्धि माना गया। क्यों उस दौर में एक नक्सली मारना भी बहुत बड़ी सफलता माना जाता था।
वीरता की पहचान नक्सल अभियानों के नेतृत्व के लिए रतनलाल डांगी को दो बार राष्ट्रपति वीरता पदक से सम्मानित किया गया।
बताया जाता है कि उस समय छत्तीसगढ़ पुलिस में वे पहले ऐसे अधिकारी थे जिन्हें यह सम्मान दो बार प्राप्त हुआ।
सेवा यात्रा: जिलों से रेंज तक
रतनलाल डांगी (IPS 2003 बैच) ने अपने करियर में छत्तीसगढ़ के कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया—
जिलों में पुलिस अधीक्षक (SP):
बीजापुर
कांकेर
बिलासपुर
कोरबा
बस्तर
रेंज स्तर पर पुलिस महानिरीक्षक (IG):
दुर्ग रेंज
बिलासपुर रेंज
सरगुजा रेंज
रायपुर रेंज (जिसमें रायपुर शहर कमिश्नरेट क्षेत्र शामिल)
अन्य दायित्व:
डायरेक्टर, पुलिस अकादमी, चंदखुरी
निष्कर्ष: एक फैसले से बनी रणनीति
बस्तर में बदलाव केवल ऑपरेशन से नहीं आया—
बल्कि एक सोच से आया—
“ब्लैक बोर्ड और ब्लैक रोड”
जहां सड़क और शिक्षा पहुंची,
वहीं से नक्सलवाद के खिलाफ स्थायी बदलाव की शुरुआत हुई।
