
✍️ भागीरथी यादव
दर्री मंडल में सरदार पटेल की पुण्यतिथि पर सन्नाटा, भाजपा की भूमिका पर उठे सवाल
कोरबा/दर्री।
देश की एकता के सूत्रधार, लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की पुण्यतिथि पर दर्री मंडल में वह दृश्य देखने को मिला, जिसने राजनीति की संवेदनाओं पर गहरे प्रश्नचिह्न लगा दिए। जिनके नाम पर मंचों से भाषण गूंजते हैं, जिनकी प्रतिमाओं पर चुनावी मौसम में मालाएं चढ़ती हैं—उन्हीं सरदार पटेल की पुण्यतिथि पर शाम ढलने तक भारतीय जनता पार्टी का कोई भी कार्यकर्ता या पदाधिकारी श्रद्धांजलि देने नहीं पहुंचा।
विडंबना यह रही कि इसी दिन पार्टी में नए अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर उत्सव का माहौल था। कार्यकर्ताओं में खुशी थी, मिठाइयां बंटी, लेकिन लौह पुरुष के प्रति कर्तव्य और संवेदना कहीं दिखाई नहीं दी। यह दृश्य न केवल चौंकाने वाला था, बल्कि उस राजनीति को भी कठघरे में खड़ा करता है, जो सरदार पटेल के नाम को अपना नैतिक कवच बताती रही है।
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों में इस उपेक्षा को लेकर तीखी नाराज़गी देखी गई। लोगों का कहना है—
“सरदार पटेल अब पोस्टर और भाषणों तक सीमित कर दिए गए हैं। ज़मीनी सच्चाई यह है कि जैसे ही पार्टी को नया ‘सरदार’ मिला, असली सरदार को भुला दिया गया।”
राजनीतिक गलियारों में भी इस घटनाक्रम को लेकर चर्चा तेज़ है। सवाल उठ रहे हैं—
क्या सरदार पटेल भाजपा के लिए अब सिर्फ चुनावी प्रतीक बनकर रह गए हैं?
क्या सत्ता, पद और उत्सव, विचारधारा और आदर्शों से ऊपर हो गए हैं?
दर्री मंडल में श्रद्धांजलि कार्यक्रम का न होना आमजन के लिए सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि भावनात्मक आघात बनकर सामने आया। लोगों का कहना है—
“जो दल अपने आदर्श पुरुषों का सम्मान नहीं कर पाता, वह देश की एकता और अखंडता की बातें कैसे कर सकता है?”
अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या भाजपा इस चूक पर आत्ममंथन करेगी, या फिर नए ‘पार्टी सरदार’ के उत्साह में इतिहास और आदर्शों को यूं ही दरकिनार करती रहेगी।
लौह पुरुष की पुण्यतिथि पर छाया यह सन्नाटा, आने वाले दिनों में राजनीति की संवेदनशीलता पर एक गूंजता सवाल बन गया है।






