नियम किताबों में, लूट तराजू पर — जनपद सीईओ के निरीक्षण में भी दबा सच

 

कैमरे के सामने उजागर हुई पहरिया धान खरीदी केंद्र की कड़वी हकीकत

जांजगीर–चांपा।

यह किसी आरोप की कहानी नहीं, बल्कि कैमरे में कैद वह है, जो पहरिया धान खरीदी केंद्र पर हर दिन किसानों के साथ हो रही है। यहां धान नहीं तौला जा रहा — किसानों का हक तौला जा रहा है।

 

शासन-प्रशासन के स्पष्ट नियम कहते हैं कि धान खरीदी में 40 किलो 680 ग्राम (धान + बोरा) की तौल होनी चाहिए, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। कैमरे के सामने 3–4 बोरों की तौल हुई और एक भी बोरा नियम के अनुसार नहीं निकला।

हर बोरे में 900 ग्राम से 1 किलो 110 ग्राम तक की खुली कटौती पाई गई। यह कोई तकनीकी गलती नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक लूट का साफ सबूत है।

सुरक्षा राशि, पर सुरक्षा नदारद

धान खरीदी केंद्र को ₹2.40 प्रति क्विंटल सुरक्षा राशि दी जाती है, लेकिन केंद्र पर न कोई गार्ड दिखा, न हमाल, न ही बुनियादी व्यवस्था। जब इस पर सवाल किया गया तो धान खरीदी प्रभारी जवाब देने से बचते नजर आए, जबकि उनके सहयोगी पत्रकारों पर ही भड़क उठे।

यहां तक कहा गया — “क्या मंडी प्रभारी अपना घर या खेत बेचकर पूर्ति करे?”

यानी सवाल किसानों की लूट पर नहीं, सवाल उठाने वालों पर!

कागज में नियम, जमीन पर नियमों की कब्र

धान की चट्टा व्यवस्था में जहां दो लेयर अनिवार्य हैं, वहां केवल एक लेयर दिखाई दी। बाहर दिखावे की भूसी, अंदर नियमों की धज्जियां।

कागजों में सब कुछ सही — लेकिन हकीकत में सब कुछ फेल।

किसान नहीं, मजदूर बना दिया गया

यहां किसान सिर्फ किसान नहीं रह गया, उसे मजदूर बना दिया गया है।

धान पलटना

बोरा सिलाई

तौल

सब काम किसान खुद कर रहा है।

एक किसान बताता है —

“मजदूर साथ लाना पड़ा, मजदूरी भी खुद देनी पड़ी, तब जाकर तौल हो पाई।”

निरीक्षण या दिखावा?

धान खरीदी प्रभारी का दावा है कि जनपद सीईओ बलौदा निरीक्षण पर आए थे, लेकिन उन्हें कोई गड़बड़ी नजर नहीं आई।

अब सवाल साफ है —

निरीक्षण था या सिर्फ औपचारिकता?

आंखें बंद थीं या सच्चाई जानबूझकर छुपाई गई?

जब प्रभारी जयप्रकाश सिंह से जवाब मांगा गया तो उन्होंने केवल “सूखती के नाम पर 900 ग्राम से 1 किलो 110 ग्राम” कहकर बाकी सवालों से किनारा कर लिया।

सवाल सिस्टम से है

अगर अब भी इस मामले में कार्रवाई नहीं हुई, तो मान लेना चाहिए कि किसानों की इस लूट में सिस्टम खुद कटघरे में खड़ा है।

कैमरा बोलेगा, सवाल जिंदा रहेंगे।

अब सबसे बड़ा सवाल —

क्या भोले-भाले किसानों को न्याय मिलेगा?

या यूं ही नियमों के खिलाफ धान खरीदी कर उनका शोषण होता रहेगा?

क्या जिम्मेदारों पर कोई सख्त कार्रवाई होगी, या फिर यह लूट यूं ही जारी रहेगी?

किसानों का सब्र टूट रहा है, अब जवाब चाहिए — सिर्फ आश्वासन नहीं।