
एमसीबी / मनेंद्रगढ़।
मनेंद्रगढ़ वन परिक्षेत्र अंतर्गत खोंगापानी क्षेत्र में कराए गए वन कार्यों को लेकर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए हैं। स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि जिन कार्यों को मानव श्रम से कराकर ग्रामीणों को रोजगार देना था, उन्हें खुलेआम जेसीबी मशीनों से कराया गया, जिससे न केवल मजदूरों का हक छीना गया बल्कि पर्यावरण के साथ भी खिलवाड़ किया गया।

रोजगार की जगह मशीनें, पर्यावरण पर भी संकट
ग्रामीणों के अनुसार बरसाती नाले में मशीनों के प्रयोग से प्राकृतिक जल प्रवाह से छेड़छाड़ की गई है। इससे आने वाले समय में जल संरक्षण व्यवस्था प्रभावित होने और क्षेत्र में पर्यावरणीय असंतुलन की आशंका बढ़ गई है। सवाल यह है कि क्या यह सब बिना उच्च अधिकारियों की जानकारी के संभव था?
अधिकारियों के संरक्षण में काम होने का आरोप
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि यह पूरा कार्य वन मंडलाधिकारी (डीएफओ), अनुविभागीय अधिकारी (एसडीओ) और संबंधित रेंजर की जानकारी एवं संरक्षण में कराया गया। जब इस संबंध में रेंजर कुर्रे से संपर्क करने का प्रयास किया गया तो उन्होंने फोन उठाना भी जरूरी नहीं समझा, जिससे संदेह और गहराता जा रहा है।
पहले भी उजागर हो चुके हैं ऐसे ही मामले
ग्रामीणों ने बताया कि इससे पहले बहरासी क्षेत्र में भी बरसाती नाले पर जेसीबी और ट्रैक्टर से तालाब निर्माण कराया गया था। उस मामले में न तो कोई जांच हुई और न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई या राशि की रिकवरी।
लगातार ऐसे मामलों से वन विभाग की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
डीएफओ मनीष कश्यप का पक्ष अब तक गायब
मामले में वन मंडलाधिकारी मनीष कश्यप का पक्ष जानने के लिए कई बार संपर्क किया गया, लेकिन उनका मोबाइल ब्लॉक मिला। एक जिम्मेदार अधिकारी का मीडिया और आम जनता से इस तरह दूरी बनाए रखना विभागीय मंशा पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
फर्जी मस्टर रोल और कमीशनखोरी के गंभीर आरोप
सूत्रों के अनुसार पूरे मामले में फर्जी मस्टर रोल भरकर मजदूरी राशि के आहरण और कमीशनखोरी के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच हो तो भुगतान प्रक्रिया, मशीनों के उपयोग और मस्टर रोल में भारी अनियमितताएं सामने आ सकती हैं।
उच्च स्तरीय जांच की मांग
ग्रामीणों ने खोंगापानी और बहरासी—दोनों मामलों में निष्पक्ष एवं उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। साथ ही मशीनों से कराए गए कार्यों की लागत, भुगतान और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की गहन जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि जल संरक्षण जैसे कार्य स्थानीय मजदूरों से कराए जाएं, ताकि विकास के साथ रोजगार भी सुनिश्चित हो।
चुप्पी या कार्रवाई?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वन विभाग के शीर्ष अधिकारी इन गंभीर आरोपों पर चुप्पी तोड़ेंगे, या यह मामला भी पहले की तरह फाइलों में दबा दिया जाएगा?
गौरतलब है कि वन विभाग की कार्यप्रणाली के विरोध में 9 दिसंबर 2025 को कांग्रेस कमेटी द्वारा उग्र प्रदर्शन भी किया गया था, लेकिन हालात आज भी जस के तस बने हुए हैं।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या खोंगापानी वन कार्य घोटाले में जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी या फिर आरोपों की यह फेहरिस्त भी सिस्टम की भेंट चढ़ जाएगी।






