
सुशील जायसवाल
कोरबा/पोड़ी उपरोड़ा।
जनपद पंचायत पोड़ी उपरोड़ा के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) के स्थानांतरण को लेकर क्षेत्र की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। CEO जय प्रकाश इड़सेना के तबादले के बाद जनपद अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और कुछ जनप्रतिनिधियों द्वारा “सुशासन तिहार” कार्यक्रम के बहिष्कार का मामला अब क्षेत्र में चर्चा का बड़ा विषय बन गया है। आम जनता से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक एक ही सवाल उठ रहा है कि क्या किसी अधिकारी के तबादले के कारण जनहित से जुड़े कार्यक्रमों का विरोध उचित है?
दरअसल, कलेक्टर कोरबा द्वारा जारी आदेश के तहत जनपद पंचायत पोड़ी उपरोड़ा के CEO जय प्रकाश इड़सेना को जिला पंचायत में नई जिम्मेदारी सौंपी गई है। वहीं उनके स्थान पर दूसरे अधिकारी को प्रभार दिया गया है। प्रशासनिक दृष्टि से यह एक सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है, क्योंकि शासन-प्रशासन समय-समय पर अधिकारियों की पदस्थापना और स्थानांतरण करता रहता है ताकि कार्यप्रणाली में संतुलन बना रहे और प्रशासनिक व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित हो सके।
लेकिन इस निर्णय के बाद जनपद पंचायत के कुछ जनप्रतिनिधियों ने नाराजगी जाहिर करते हुए शासन के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम “सुशासन तिहार” से दूरी बना ली। इस बहिष्कार को लेकर क्षेत्र में मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कई नागरिकों का मानना है कि जनप्रतिनिधियों का दायित्व जनता की समस्याओं का समाधान करना और विकास कार्यों को गति देना है, न कि किसी एक अधिकारी के स्थानांतरण को मुद्दा बनाकर सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूरी बनाना।
स्थानीय लोगों का कहना है कि शासन की योजनाएं किसी व्यक्ति विशेष पर आधारित नहीं होतीं, बल्कि पूरी व्यवस्था और जवाबदेही पर टिकी होती हैं। यदि प्रशासनिक व्यवस्था मजबूत हो और जनप्रतिनिधियों की मंशा जनहित में हो, तो अधिकारी बदलने के बावजूद विकास कार्यों और योजनाओं के क्रियान्वयन पर असर नहीं पड़ना चाहिए।
क्षेत्र के बुद्धिजीवियों और राजनीतिक जानकारों का भी मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में पद और व्यक्ति अस्थायी होते हैं, लेकिन जनता के हित और विकास कार्य सर्वोपरि होने चाहिए। ऐसे में किसी अधिकारी के तबादले को लेकर शासन के कार्यक्रमों का बहिष्कार करना कई सवाल खड़े करता है।
वहीं कुछ लोग यह भी मानते हैं कि जनप्रतिनिधियों की नाराजगी के पीछे स्थानीय स्तर पर समन्वय और कार्यशैली से जुड़े मुद्दे हो सकते हैं, जिन्हें संवाद के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए। हालांकि अब तक प्रशासन की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
फिलहाल क्षेत्र में यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अब देखना होगा कि जनप्रतिनिधियों का यह विरोध आगे किस दिशा में जाता है और क्या प्रशासन एवं जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद स्थापित हो पाता है या नहीं।
क्षेत्र में फिलहाल एक ही सवाल गूंज रहा है—
“क्या किसी अधिकारी के तबादले के कारण जनहित के कार्यक्रमों का बहिष्कार उचित है?”
