✍️ भागीरथी यादव
कोरबा। झीरम घाटी हत्याकांड मामले में एनआईए कोर्ट के फैसले को पूर्व मंत्री एवं कांग्रेस नेता जयसिंह अग्रवाल ने आधा-अधूरा न्याय बताया है। कोरबा कांग्रेस कार्यालय में पत्रकारों से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस अदालत के फैसले का सम्मान करती है, लेकिन झीरम हत्याकांड के पीछे की पूरी साजिश का अब तक पर्दाफाश नहीं हो सका है। उन्होंने आरोप लगाया कि एनआईए की जांच शुरू से ही दिशाहीन रही और राजनीतिक षड्यंत्र के पहलुओं की पर्याप्त जांच नहीं की गई।
जयसिंह अग्रवाल ने कहा कि 23 मई 2013 को हुए झीरम नरसंहार में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं समेत 32 लोगों की हत्या हुई थी। उनके मुताबिक, एनआईए ने जिन 10 लोगों को गिरफ्तार किया और जिन्हें अदालत ने दोषी पाया, वे छोटे स्तर के नक्सली थे। इतनी बड़ी घटना बड़े नक्सली नेताओं के बिना संभव नहीं थी।
उन्होंने सवाल उठाया कि एनआईए की शुरुआती एफआईआर में माओवादी नेताओं गणपति उर्फ मुपल्ला लक्ष्मण राव और रमन्ना समेत कई नक्सली नेताओं के नाम शामिल थे। 21 मार्च 2014 को गणपति और रमन्ना सहित 26 फरार आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया गया था, लेकिन बाद में चार्जशीट से इनके नाम हटा दिए गए। उन्होंने पूछा कि आखिर इन नामों को जांच के दायरे से क्यों हटाया गया।
पूर्व मंत्री ने कहा कि झीरम हमले में वांछित घोषित किए गए कई नक्सलियों के बाद में आत्मसमर्पण करने के बावजूद उनसे एनआईए ने पूछताछ क्यों नहीं की। उन्होंने चैतू उर्फ श्याम दादा, रुपेश उर्फ मोल्ला राजिरेड्डी, निर्मला उर्फ सुमित्रा, भूपति उर्फ सोनू दादा और केंद्रीय समिति सदस्य सुजाता के आत्मसमर्पण का उल्लेख करते हुए इनसे पूछताछ और अभियोजन को लेकर सवाल उठाए।
जयसिंह अग्रवाल ने यह भी पूछा कि परिवर्तन यात्रा की सुरक्षा क्यों हटाई गई थी, यात्रा का मार्ग किसके कहने पर बदला गया और हमले की योजना किसने बनाई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि हमले में घायल होकर जीवित बचे प्रत्यक्षदर्शियों के बयान भी जांच में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किए गए।

उन्होंने कहा कि भाजपा नहीं चाहती कि झीरम हत्याकांड का पूरा सच सामने आए। कांग्रेस नेता ने मांग की कि मामले की जांच में राजनीतिक षड्यंत्र और बड़े नक्सली नेताओं की भूमिका समेत सभी पहलुओं को सामने लाया जाए, ताकि झीरम के पीड़ित परिवारों को पूर्ण न्याय मिल सके।
