
✍️ भागीरथी यादव
स्वास्थ्य बीमा के नाम पर जनता के भरोसे से बड़ा खेल!
देशभर में स्वास्थ्य बीमा कंपनियों को लेकर लोगों की नाराजगी लगातार बढ़ती जा रही है। आम आदमी बीमारी और आपात स्थिति में आर्थिक सुरक्षा की उम्मीद से वर्षों तक भारी प्रीमियम भरता है, लेकिन जब इलाज का समय आता है तो कई बीमा कंपनियों पर क्लेम देने से बचने के आरोप लग रहे हैं। विशेष रूप से Star Health and Allied Insurance को लेकर सोशल मीडिया, उपभोक्ता मंचों और आम लोगों के बीच लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं।
पीड़ित परिवारों का आरोप है कि लाखों रुपये इलाज में खर्च होने के बाद भी कंपनियां कभी “पुरानी बीमारी”, कभी “तकनीकी त्रुटि” तो कभी “पॉलिसी की शर्तों” का हवाला देकर क्लेम अस्वीकृत कर देती हैं। लोगों का कहना है कि जब जरूरत के समय ही बीमा कंपनी जिम्मेदारी से पीछे हट जाए, तो आखिर आम आदमी किस भरोसे प्रीमियम भरता रहे?
स्वास्थ्य बीमा कंपनियां बड़े-बड़े विज्ञापनों और आकर्षक दावों के जरिए सुरक्षा का भरोसा देती हैं, लेकिन उपभोक्ताओं का आरोप है कि असली संकट के समय मरीजों और उनके परिवारों को मानसिक, आर्थिक और कानूनी संघर्ष के लिए अकेला छोड़ दिया जाता है। अस्पतालों के चक्कर, दस्तावेजों की लंबी प्रक्रिया और बार-बार क्लेम रिजेक्ट होने से परिवारों पर दोहरी मार पड़ रही है।
बीमा विशेषज्ञों का मानना है कि पॉलिसियों में लिखी जटिल शर्तें और छोटे अक्षरों में दिए गए नियम आम ग्राहकों की समझ से बाहर होते हैं। कई बार एजेंट पॉलिसी बेचते समय फायदे तो गिनाते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण शर्तों और सीमाओं की स्पष्ट जानकारी नहीं देते। इसका खामियाजा बाद में उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ता है।
अब जनता के बीच बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या स्वास्थ्य बीमा केवल कंपनियों के मुनाफे का साधन बनकर रह गया है? यदि क्लेम के समय इतनी बाधाएं खड़ी की जाती हैं, तो नियामक संस्थाएं और उपभोक्ता संरक्षण तंत्र आखिर क्या कर रहे हैं?
विशेषज्ञ उपभोक्ताओं को सलाह दे रहे हैं कि किसी भी हेल्थ पॉलिसी को लेने से पहले कंपनी का क्लेम सेटलमेंट रिकॉर्ड, ग्राहक शिकायतें, उपभोक्ता अनुभव और पॉलिसी की सभी शर्तों की गंभीरता से जांच करें। केवल विज्ञापन और एजेंट की बातों पर भरोसा करना भविष्य में भारी पड़ सकता है।
जरूरत पड़ने पर पीड़ित उपभोक्ता Insurance Regulatory and Development Authority of India, उपभोक्ता फोरम और कानूनी माध्यमों का सहारा लेकर न्याय की मांग कर सकते हैं। क्योंकि स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा मामला केवल व्यापार नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और सुरक्षा का प्रश्न है।
सबसे बड़ा सवाल
क्या बीमा कंपनियां जनता की सुरक्षा के लिए हैं, या सिर्फ प्रीमियम वसूलने के लिए?
