पोलमी का स्वामी आत्मानंद हाईस्कूल एक साल से ताले में कैद, मूल्यांकन की सुस्ती ने रोका हैंडओवर, छात्रों का भविष्य अधर में
तैयार भवन में नहीं गूंज रही बच्चों की आवाज, लैब और कम्प्यूटर कक्ष बने शोपीस
शिक्षा सत्र शुरू होने को तैयार, लेकिन प्रशासनिक प्रक्रियाओं में फंसी करोड़ों की शैक्षणिक उम्मीदें
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सुशील जायसवाल
कोरबा/पाली।
एक ओर सरकार प्रदेशभर में शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक लापरवाही और प्रक्रियात्मक विलंब के कारण कई योजनाएं धरातल पर दम तोड़ती नजर आ रही हैं। ऐसा ही एक मामला कोरबा जिले के पाली विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत पोलमी में सामने आया है, जहां लगभग 90 लाख रुपये की लागत से निर्मित स्वामी आत्मानंद हाईस्कूल का भवन पिछले एक वर्ष से ताले में बंद पड़ा हुआ है।
विडंबना यह है कि जिस भवन में विद्यार्थियों के सपनों को नई उड़ान मिलनी थी, वहां आज सन्नाटा पसरा हुआ है। आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित प्रयोगशाला, कम्प्यूटर कक्ष और नवनिर्मित भवन विद्यार्थियों के इंतजार में खड़े हैं, लेकिन प्रशासनिक फाइलों की धीमी रफ्तार ने इन सुविधाओं को छात्रों की पहुंच से दूर कर दिया है।
भवन तैयार, लेकिन मूल्यांकन के अभाव में अटका मामला
जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत पोलमी में वर्ष 2024-25 के दौरान तत्कालीन सरपंच के कार्यकाल में स्वामी आत्मानंद हाईस्कूल के लिए भवन मरम्मत, प्रयोगशाला कक्ष, कम्प्यूटर कक्ष एवं अन्य आवश्यक अधोसंरचना का निर्माण कराया गया था। निर्माण कार्य निर्धारित समय में पूरा हो गया और भवन उपयोग के लिए तैयार भी है।
लेकिन निर्माण कार्य का अंतिम मूल्यांकन आज तक नहीं हो सका है। मूल्यांकन रिपोर्ट लंबित होने के कारण अंतिम किश्त की राशि जारी नहीं हो पाई है। परिणामस्वरूप भवन का औपचारिक हैंडओवर शिक्षा विभाग को नहीं किया गया है। यही वजह है कि एक वर्ष बीत जाने के बाद भी यह भवन विद्यार्थियों के लिए नहीं खुल पाया है।
16 जून से नया सत्र, लेकिन सुविधाओं पर लगा ताला
प्रदेशभर के स्कूलों में नया शिक्षा सत्र 16 जून से प्रारंभ होने जा रहा है। ऐसे समय में पोलमी के विद्यार्थियों और अभिभावकों की चिंता बढ़ गई है। स्वामी आत्मानंद विद्यालय में प्रवेश लेने वाले छात्र-छात्राएं आधुनिक सुविधाओं के साथ पढ़ाई करने का सपना देख रहे हैं, लेकिन वर्तमान स्थिति में उन्हें पुराने भवन और सीमित संसाधनों के सहारे पढ़ाई करनी पड़ सकती है।
विशेष रूप से विज्ञान संकाय के विद्यार्थियों को प्रयोगशाला की सुविधा नहीं मिल पाएगी, जबकि कम्प्यूटर शिक्षा भी प्रभावित होने की आशंका है। करोड़ों रुपये खर्च कर तैयार की गई सुविधाएं ताले में बंद हैं और विद्यार्थी बुनियादी संसाधनों के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं।
लाखों खर्च, फिर भी सुविधाओं से वंचित बच्चे
ग्रामीणों और पालकों का कहना है कि सरकार ने ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को शहरों जैसी शिक्षा सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बड़ी राशि खर्च की, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के कारण उसका लाभ विद्यार्थियों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
अभिभावकों का कहना है कि जब भवन पूरी तरह तैयार है तो केवल एक मूल्यांकन प्रक्रिया के कारण उसे छात्रों के उपयोग के लिए क्यों नहीं खोला जा रहा है? यदि सभी निर्माण कार्य पूर्ण हो चुके हैं तो संबंधित विभागों को प्राथमिकता के आधार पर मूल्यांकन कर हैंडओवर की प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए।
पालकों में बढ़ रहा आक्रोश
स्थानीय पालकों और जनप्रतिनिधियों में इस मामले को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि आज के दौर में विज्ञान और कम्प्यूटर शिक्षा विद्यार्थियों के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन पोलमी के बच्चे इन सुविधाओं से वंचित रह जाएंगे।
एक अभिभावक ने कहा,
“सरकार ने बच्चों के लिए शानदार भवन बनवाया, लैब और कम्प्यूटर कक्ष तैयार किए गए, लेकिन एक साल से उन पर ताला लगा है। आखिर इसका जिम्मेदार कौन है? हमारे बच्चों का नुकसान कौन भरेगा?”
दूसरे पालक ने कहा,
“जब भवन तैयार है तो उसे तत्काल शुरू किया जाना चाहिए। प्रशासन को सिर्फ फाइलें नहीं देखनी चाहिए, बल्कि बच्चों के भविष्य को भी समझना चाहिए।”
शिक्षा के मंदिर में पसरा सन्नाटा
जहां इस समय नए शिक्षा सत्र की तैयारियों को लेकर स्कूलों में चहल-पहल दिखाई देनी चाहिए थी, वहीं पोलमी के इस अत्याधुनिक भवन में सन्नाटा पसरा हुआ है। कक्षाएं तैयार हैं, फर्नीचर की व्यवस्था हो चुकी है, प्रयोगशालाएं बनी हुई हैं, लेकिन उनमें विद्यार्थियों की मौजूदगी नहीं है।
यह स्थिति न केवल सरकारी योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि प्रशासनिक स्तर पर छोटी-सी देरी किस प्रकार सैकड़ों विद्यार्थियों के भविष्य को प्रभावित कर सकती है।
जिला प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग
ग्रामीणों, पालकों और विद्यार्थियों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि विद्यालय भवन का लंबित मूल्यांकन तत्काल कराया जाए तथा शेष राशि जारी कर भवन को शिक्षा विभाग के सुपुर्द किया जाए, ताकि नए शिक्षा सत्र की शुरुआत से पहले छात्र-छात्राएं आधुनिक प्रयोगशाला, कम्प्यूटर कक्ष और अन्य सुविधाओं का लाभ उठा सकें।
लोगों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो 90 लाख रुपये की लागत से बना यह भवन केवल एक बंद ढांचा बनकर रह जाएगा और शिक्षा के क्षेत्र में किए गए बड़े निवेश का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कब खुलेगा पोलमी के बच्चों के सपनों का यह स्कूल? और कब प्रशासन की फाइलों से निकलकर विद्यार्थियों के हाथों में पहुंचेंगी वे सुविधाएं, जिनके लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं?
