बिलासपुर में प्रशासनिक अधिकारी को निशाना बनाने की साजिश? छवि धूमिल करने के लिए पुरानी फाइलों का सहारा

ज्ञान शंकर तिवारी

 

 

कोरबा/बिलासपुर | ज्ञान शंकर तिवारी

न्यायधानी बिलासपुर में इन दिनों प्रशासनिक गलियारों में एक नया विवाद गर्माया हुआ है। भू-अर्जन शाखा में पदस्थ अधीक्षक खिलेन्द्र यादव के खिलाफ कुछ वेब पोर्टलों द्वारा चलाए जा रहे ‘नकारात्मक अभियान’ ने पत्रकारिता की नैतिकता और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अधीक्षक यादव ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे व्यक्तिगत द्वेष से प्रेरित एक सोची-समझी साजिश करार दिया है।

भ्रामक खबरों पर अधीक्षक का कड़ा रुख

लगातार लग रहे आरोपों पर चुप्पी तोड़ते हुए अधीक्षक खिलेन्द्र यादव ने स्पष्ट किया कि प्रसारित खबरें पूरी तरह तथ्यहीन और भ्रामक हैं। उन्होंने कहा:

“बिना मेरा पक्ष जाने और बिना किसी आधिकारिक दस्तावेज की पुष्टि किए खबरें चलाना पत्रकारिता के सिद्धांतों के विरुद्ध है। यह केवल एकतरफा छवि बनाने का प्रयास है।”

शिकायत की विश्वसनीयता पर सवाल

रिपोर्ट के अनुसार, जिस शिकायत के आधार पर खबरें बनाई जा रही हैं, वह किसी ‘छद्म नाम’ (Anonymous) से की गई प्रतीत होती है। सामान्य प्रशासन विभाग के नियमानुसार, बिना नाम और पते की शिकायतों का कोई आधार नहीं होता। अधीक्षक ने दावा किया कि विभाग को अब तक ऐसी कोई वैध शिकायत प्राप्त ही नहीं हुई है।

प्रमुख बिंदुओं पर स्पष्टीकरण

 

विषय अधीक्षक खिलेन्द्र यादव का पक्ष

निलंबन विवाद 3 वर्ष पूर्व कलेक्टर की जांच में डेटा लीक या अनियमितता के आरोप गलत पाए गए थे। शासन ने जांच रिपोर्ट के आधार पर बहाल किया था। अब इसे दोबारा उठाना केवल चरित्र हनन है।

पदस्थापना एक ही जिले में पदस्थ रहना शासन का निर्णय है। प्रशासन को हर माह अपडेटेड जानकारी भेजी जाती है। इसमें कुछ भी गोपनीय या गलत नहीं है।

सीमांकन एवं डायवर्सन भू राजस्व संहिता के अनुसार ये अधिकार तहसीलदार और SDM के पास हैं। अधीक्षक भू अभिलेख का इसमें सीधा हस्तक्षेप नहीं होता।

जांच रिपोर्ट 28 मई 2025 की शिकायत पर कलेक्टर द्वारा भेजी गई जांच रिपोर्ट में आरोपों को ‘निराधार और द्वेषपूर्ण’ बताया जा चुका है।

निजता का हनन और मानसिक प्रताड़ना

अधीक्षक यादव ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी निजी और गोपनीय जानकारियों को सार्वजनिक कर उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्होंने इसे अपनी निजता और स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों का हनन बताया है।

निष्कर्ष: सच क्या है?

न्यायधानी में चर्चा आम है कि क्या यह वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज है या फिर किसी कर्मठ अधिकारी को रास्ते से हटाने का प्रयास? फिलहाल, आधिकारिक दस्तावेजों और कलेक्टर की जांच रिपोर्ट अधीक्षक के पक्ष में झुकी नजर आती है। अब देखना यह होगा कि भ्रामक खबरें फैलाने वाले पोर्टलों पर शासन क्या रुख अपनाता है।