स्मृति शेष : छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री स्व अजित जोगी जी

“मैं रहूँ या न रहूँ, छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ियत हमेशा जीवित रहनी चाहिए”

अजीत जोगी एक ‘अमिट’ व्यक्तित्व, जिसने गढ़ा नए राज्य का सपना

सपनों का छत्तीसगढ़ गढ़ने वाले ‘जोगी’ को प्रदेश ने किया नमन”

एक कुशल शिल्पकार की कमी आज भी खलती है: जोगी जयंती पर याद आई नए राज्य की वो पहली नींव”

प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक दूरदर्शिता का संगम थे प्रदेश के पहले मुखिया

कोरबा //
छत्तीसगढ़ की राजनीति के चाणक्य और प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी की आज जन्म जयंती है। एक आईएएस अधिकारी से मुख्यमंत्री तक का सफर तय करने वाले जोगी जी का व्यक्तित्व भारतीय राजनीति में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। आज उनकी जयंती पर पूरा प्रदेश उन्हें याद कर रहा है।

बहुआयामी प्रतिभा के धनी: कलेक्टर से ‘जनता के मुख्यमंत्री’ तक

अजीत जोगी का जीवन संघर्ष और सफलता की एक ऐसी मिसाल है जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। एक मेधावी छात्र के रूप में उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, फिर आईपीएस और उसके बाद आईएएस बनकर प्रशासनिक सेवाओं में अपना लोहा मनवाया। लेकिन उनकी नियति में छत्तीसगढ़ के करोड़ों लोगों की सेवा लिखी थी। राजनीति में कदम रखते ही उन्होंने अपनी विद्वत्ता और वाक्पटुता से दिल्ली के गलियारों से लेकर बस्तर के जंगलों तक अपनी एक अलग पहचान बनाई।

नए छत्तीसगढ़ की नींव और ‘जोगी’ मॉडल

1 नवंबर 2000 को जब छत्तीसगढ़ एक नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आया, तब इसकी कमान अजीत जोगी के हाथों में सौंपी गई। एक नए राज्य के सामने जो चुनौतियाँ थीं, उन्हें जोगी जी ने एक अवसर में बदला। उन्होंने न केवल प्रशासनिक ढांचा खड़ा किया, बल्कि शिक्षा, अधोसंरचना और अंत्योदय की दिशा में ऐसे कार्य किए जिसने राज्य के विकास की नींव रखी।

गरीबों और आदिवासियों की मुखर आवाज

अजीत जोगी की राजनीति का केंद्र हमेशा से ही समाज का वंचित वर्ग रहा। वे छत्तीसगढ़ के जल, जंगल और जमीन की समस्याओं को बखूबी समझते थे। यही कारण था कि वे आदिवासियों और ग्रामीणों के बीच बेहद लोकप्रिय थे। उनकी ‘जोगी वाली शैली’—चाहे वह भाषण देने का तरीका हो या लोगों से सीधा संवाद—उन्हें भीड़ से अलग करती थी।

संघर्षों से कभी नहीं हारी हिम्मत

जीवन के अंतिम पड़ाव में शारीरिक चुनौतियों और राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। व्हीलचेयर पर होने के बाद भी उनकी सक्रियता किसी ऊर्जावान युवा से कम नहीं थी। उन्होंने क्षेत्रीय राजनीति को एक नया आयाम दिया और ‘छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़िया’ के सम्मान की लड़ाई को अपनी अंतिम सांस तक लड़ा।

आज भी प्रासंगिक हैं उनके विचार

आज छत्तीसगढ़ विकास की जिस ऊंचाई पर खड़ा है, उसमें अजीत जोगी के विजन का बड़ा योगदान है। उनकी जयंती केवल एक व्यक्ति की याद नहीं, बल्कि उस संकल्प की याद है जो एक समृद्ध और आत्मनिर्भर छत्तीसगढ़ बनाने के लिए लिया गया था।
“जोगी एक व्यक्ति नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की राजनीति का वो अध्याय हैं जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।”

जोगी जी का जीवन एक नजर में

* जन्म        :           29 अप्रैल, 1946 (गौरेला)। देहावसान
* शिक्षा        :           एमई (इंजीनियरिंग), स्वर्ण पदक विजेता।
* करियर      :           आईपीएस, फिर आईएएस (इंदौर के सबसे लंबे समय तक                                       रहे  कलेक्टर)।
* राजनीति   :            राज्यसभा सदस्य, लोकसभा सदस्य और छत्तीसगढ़ के                                        प्रथम मुख्यमंत्री।
* उपलब्धि     :          छत्तीसगढ़ की क्षेत्रीय अस्मिता को राष्ट्रीय स्तर पर                                               पहचान दिलाई।
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अजीत जोगी: छत्तीसगढ़ी अस्मिता का वह दीदा-वर चेहरा

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा। अल्लामा इक़बाल की ये कालजयी पंक्तियाँ छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी के व्यक्तित्व पर अक्षरशः खरी उतरती हैं। वे एक ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व थे कि उन्होंने जिस भी क्षेत्र में कदम रखा, उसे फतह किया। उन्होंने इंजीनियरिंग चुना तो टॉप में रहे, यूपीएससी दिया तो टॉप में रहे और जब जननेता बने तो लोगों के दिलों पर राज किया। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी स्वाभिमान के एक ऐसे प्रतीक थे, जिन्होंने पृथक राज्य बनने की सुगबुगाहट के दौर में ही यहाँ की अस्मिता की अलख जगा दी थी।
जोगी जी का प्रथम तीन वर्ष का मुख्य मंत्रित्व काल छत्तीसगढ़ के नव-निर्माण का काल माना जाता है। एक नए राज्य के पास न तो पर्याप्त बुनियादी ढांचा था और न ही कोई सुव्यवस्थित प्रशासनिक व्यवस्था, लेकिन जोगी जी के प्रशासनिक अनुभव ने इसे शून्य से शिखर की ओर अग्रसर किया। उनके शुरुआती तीन सालों के कुछ क्रांतिकारी विकास कार्य आज भी प्रदेश की प्रगति के आधार स्तंभ हैं। उन्होंने स्कूली छात्राओं को कंप्यूटर शिक्षा से जोड़ने के लिए इंदिरा सूचना शक्ति योजना शुरू की, जो उस समय के भारत में एक साहसिक और दूरदर्शी कदम था। इसके साथ ही नए राज्य की राजधानी और जिलों को जोड़ने के लिए सड़कों के चौड़ीकरण और नए पुल-पुलियों के निर्माण में उन्होंने अभूतपूर्व गति दिखाई। किसानों के लिए सिंचाई सुविधाओं का विस्तार और कृषि आधारित नीतियों को प्राथमिकता देना उनके शुरुआती विजन का हिस्सा था।
उनका जीवन विपरीत परिस्थितियों से टकराकर अपना वजूद गढ़ने की एक जीवंत प्रेरणा है। एक कलेक्टोरेट की कुर्सी को छोड़कर राजनीति के शिखरों को छूना और फिर जीवन के अंतिम दौर में व्हीलचेयर पर रहते हुए भी छत्तीसगढ़िया हक की लड़ाई लड़ना, उनके अदम्य साहस को दर्शाता है। उनकी हाजिरजवाबी के किस्से आज भी चाम्पा से लेकर दिल्ली तक सुनाए जाते हैं। वर्ष 2003 के चुनाव पूर्व सम्मेलनों में उनकी वह मुस्कुराहट और कहना कि— टिकट वोई ल मिलहि जेकर माथा म लिखाय है — आज भी कार्यकर्ताओं के चेहरों पर हंसी ले आता है।
पत्नी डॉ. रेणु जोगी की पुस्तक अजीत जोगी की अनकही कहानियाँ और उनके द्वारा दिए गए नारे— मैं रहूँ या न रहूँ, छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ियत हमेशा जीवित रहनी चाहिए — इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने राज्य को केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक पहचान दी। आज जोगी जी भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा रखे गए विकास के पत्थर और छत्तीसगढ़ियत की गूँज इस माटी में हमेशा जीवित रहेगी।