” *जंगल में पत्ता हिले तो खबर,* *फिर सैकड़ों ट्रैक्टर रेत* *कैसे हो रही गायब?”*
*कोरबा/पसान।*
वन क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा का दायित्व निभाने वाले विभाग पर ही अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। क्षेत्र के ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है कि जिन जंगलों में बिना अनुमति प्रवेश करना भी आसान नहीं होता, वहां से कथित तौर पर वर्षों से बड़े पैमाने पर रेत का उत्खनन कैसे जारी है। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर इस पूरे खेल की जानकारी संबंधित अधिकारियों को नहीं थी या फिर सब कुछ उनकी जानकारी में ही संचालित हो रहा था?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि वन क्षेत्र की नदियों और नालों से लगातार रेत निकाली जा रही है। यदि आरोपों में सच्चाई है तो यह केवल एक सामान्य प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के सुनियोजित दोहन का गंभीर मामला माना जाएगा। ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग की चौकसी और निगरानी व्यवस्था इतनी मजबूत मानी जाती है कि जंगल में लकड़ी कटाई, शिकार या अन्य गतिविधियों की सूचना तत्काल मिल जाती है, लेकिन रेत से भरे ट्रैक्टर और भारी वाहन वर्षों तक बेरोकटोक निकलते रहे और कार्रवाई नगण्य रही।
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*वन रक्षक या रेत कारोबार के* *संरक्षक?*
क्षेत्र में सबसे अधिक चर्चा वन विभाग के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका को लेकर हो रही है। स्थानीय सूत्रों का आरोप है कि संबंधित वन क्षेत्र में कथित अवैध रेत उत्खनन का पूरा नेटवर्क लंबे समय से सक्रिय है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि विभाग वास्तव में सख्त होता तो इतनी बड़ी मात्रा में रेत निकालना संभव ही नहीं था।
लोग सवाल उठा रहे हैं कि जिन अधिकारियों को वन संपदा की रक्षा के लिए नियुक्त किया गया है, उनके कार्यकाल में ही जंगलों के भीतर स्थित नदियों और नालों का सीना क्यों छलनी हो रहा है? रेत से भरे वाहनों का आवागमन किसी से छिपा नहीं है, फिर भी कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकता दिखाई देती है। इससे विभागीय कार्यप्रणाली पर संदेह और गहरा होता जा रहा है।
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*बभनी नदी और दोड़ीपारा नाला* *बने अवैध उत्खनन के* *केंद्र?*
ग्रामीणों के अनुसार बहनी नदी तथा दोड़ीपारा क्षेत्र के नालों से बड़े पैमाने पर रेत निकाले जाने की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं। ये जलस्रोत केवल रेत के भंडार नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के पर्यावरणीय संतुलन की जीवनरेखा हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार नदियों से अनियंत्रित रेत खनन होने पर जलधारण क्षमता प्रभावित होती है, भूजल स्तर नीचे जाता है और बरसात के दौरान कटाव की समस्या बढ़ जाती है। यदि वन भूमि के भीतर स्थित जलस्रोतों से अवैध उत्खनन हुआ है, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों तक देखने को मिल सकता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि मुनाफे की अंधी दौड़ में प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है और जिम्मेदार विभाग मूकदर्शक बना हुआ है।
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*क्या वन भूमि को बना दिया* *गया निजी खदान क्षेत्र?*
वन क्षेत्र में किसी भी प्रकार की खनन गतिविधि के लिए निर्धारित नियम और कानूनी प्रक्रियाएं होती हैं। ऐसे में यदि वन भूमि से बिना वैध अनुमति के रेत निकाली गई है, तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि शासन को राजस्व हानि पहुंचाने वाला गंभीर अपराध भी हो सकता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई स्थानों पर नदी और नालों की प्राकृतिक संरचना बदलती दिखाई दे रही है। यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो कथित अवैध उत्खनन का पूरा सच सामने आ सकता है।
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*शिकायतें हुईं, लेकिन कार्रवाई* *क्यों नहीं?*
क्षेत्रवासियों का दावा है कि कई बार मौखिक और लिखित शिकायतें की गईं, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। यही वजह है कि अब लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि क्या शिकायतें नीचे स्तर पर ही दबा दी जाती हैं या मामला किसी बड़े संरक्षण तंत्र तक पहुंचता है?
ग्रामीणों का कहना है कि यदि विभाग निष्पक्ष है तो अब तक कितने वाहनों की जब्ती हुई, कितने प्रकरण दर्ज किए गए और किन-किन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई, इसकी सार्वजनिक जानकारी सामने लाई जानी चाहिए।
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*राजस्व और पर्यावरण दोनों को* *नुकसान*
कथित अवैध रेत उत्खनन का सीधा असर दो स्तरों पर पड़ता है। पहला, शासन को मिलने वाला राजस्व प्रभावित होता है। दूसरा, पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता है। नदी-नालों की प्राकृतिक संरचना बदलने से जल संरक्षण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास भी प्रभावित होते हैं।
पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगी तो आने वाले वर्षों में क्षेत्र को गंभीर पारिस्थितिक संकट का सामना करना पड़ सकता है।
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*जनता की मांग : हो स्वतंत्र और* *उच्चस्तरीय जांच*
क्षेत्र के लोगों ने पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि ड्रोन सर्वे, जीपीएस मैपिंग और राजस्व-वन विभाग की संयुक्त टीम द्वारा भौतिक सत्यापन कराया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वन क्षेत्र से कितनी मात्रा में रेत निकाली गई और इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि जांच केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों और अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई भी होनी चाहिए।
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*जनता पूछ रही है…*
● क्या वन क्षेत्र की नदियां और नाले रेत माफियाओं के हवाले कर दिए गए हैं?
● क्या जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच होगी?
● क्या शासन को हुई संभावित राजस्व हानि की भरपाई की जाएगी?
● क्या जंगल और जलस्रोत बचेंगे या रेत माफियाओं का दबदबा और बढ़ेगा?
● आखिर वर्षों से जारी इस कथित खेल के पीछे कौन-कौन लोग शामिल हैं?
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(नोट : यह समाचार स्थानीय लोगों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों, चर्चाओं और मांगों पर आधारित है। आरोपों की निष्पक्ष जांच और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना शेष है।)
