✍🏼 मनोज यू शर्मा
उपचुनावों को अक्सर सत्ताधारी दलों के पक्ष में माना जाता है, जहाँ प्रशासनिक मशीनरी और सरकारी प्रभाव नतीजों पर हावी रहते हैं। लेकिन बिहार की बांकीपुर और मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर मिले हालिया संदेश किसी सामान्य उपचुनाव जैसे नहीं हैं। यह एक ऐसी खामोश बगावत का संकेत हैं, जो बूथ तक न जाकर घर पर बैठने वाले ‘पारंपरिक मतदाताओं’ ने दर्ज कराई है। बांकीपुर में लगभग 34–35 फीसदी मतदान होना और दतिया में भी मतदाताओं का उदासीन रहना यह साबित करता है कि बीजेपी के कैडर में वह ऊर्जा गायब थी जो आम तौर पर उसके विजय रथ को रफ्तार देती है।

0 जन-असंतोष के मुद्दे और ‘घर पर बैठने’ का जनादेश
इस बार के उपचुनावों में बीजेपी के अपने वोट बैंक के बीच भारी असमंजस और आक्रोश देखा गया। राम मंदिर में चढ़ावे और प्रबंधन से जुड़ी गड़बड़ियों की खबरों ने धार्मिक-सांस्कृतिक रूप से जुड़े मतदाताओं के मन में ठेस पहुंचाई। इसके साथ ही, स्थानीय और नीतिगत स्तर पर एथेनॉल नीति को लेकर भ्रम, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में 5 जांबाज जवानों की शहादत के बाद खड़े हुए संवेदनशील सवाल और ‘कॉकरोच आंदोलन’ के जरिए उभरे सिविल और प्रशासनिक मुद्दों की कील ने कार्यकर्ताओं के उत्साह को ठंडा कर दिया।

सबसे विचारणीय बात वह मानसिकता है जो एक मतदाता के बयान में झलकती है: “हम सरकार और नीतियों से आहत हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम किसी और को वोट दे दें।” इसी भावना का नतीजा यह हुआ कि मतदाताओं ने विपक्ष के पाले में जाने के बजाय ‘वोट न देने’ का रास्ता चुना। यह निष्क्रियता सीधे तौर पर बीजेपी के मजबूत गढ़ों में उसकी हार की वजह बन गई।
0 गुजरात का ‘मोदी मैजिक’ बनाम मध्य भारत की चुनौतियाँ
इसी दौरान गुजरात की मांजलपुर सीट पर मिली बीजेपी की जीत यह दर्शाती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रभाव और गुजरात का मॉडल अब भी अपनी जगह कायम है। वहां का मतदाता राष्ट्रीय पहचान और नेतृत्व की साख पर मुहर लगा रहा है। लेकिन जब हम मध्य भारत और बिहार के परिदृश्य को देखते हैं, तो संदेश अलग है।
मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर सरकार की पूरी ताकत झोंकने के बावजूद पार्टी का पिछड़ना और अंतर्कलह का बाहर आना यह दिखाता है कि राज्य स्तर की एंटी-इन्कंबेंसी
को सिर्फ केंद्रीय नेतृत्व के नाम पर नहीं ढाला जा सकता। दतिया और बांकीपुर दोनों जगहों पर हार का राजनीतिक संदेश यह है कि स्थानीय मुद्दे और कैडर की नाराजगी अब भारी पड़ने लगी है।
0 बांकीपुर का झटका: राष्ट्रीय अध्यक्ष की साख और प्रशांत किशोर का धमाकेदार आगाज़
बीजेपी के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक झटका बिहार का बांकीपुर सीट रहा। यह वह सीट है जहां से बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन लगातार 5 बार विधायक रहे और जिसे पार्टी का ‘अभेद्य किला’ माना जाता था। भले ही पार्टी ने वहां से दूसरा उम्मीदवार (नीरज कुमार सिन्हा) उतारा, लेकिन 15 दिनों के सघन प्रचार, रोड शो और राष्ट्रीय नेतृत्व के साख के बावजूद हार का सामना करना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।
दूसरी ओर, जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने अपनी सीधी चुनावी पारी की शुरुआत में ही जो बढ़त और जीत हासिल की है, वह धमाकेदार है। भले ही पिछले चुनाव में उनकी पार्टी को अपेक्षित सफलता न मिली हो, लेकिन बांकीपुर जैसे बीजेपी के सबसे मजबूत शहरी गढ़ में सेंध लगाकर प्रशांत किशोर ने यह साबित कर दिया है कि वे बिहार की राजनीति में एक वास्तविक और गंभीर तीसरे विकल्प के रूप में उभर चुके हैं। अब वे और अधिक आत्मविश्वास के साथ आगामी राजनीतिक समर में एक बड़ी पारी की तैयारी में जुटेंगे।सबसे बड़ी बात पीके की जीत से ये होगी कि अब बिहार की राजनीति में “गवर्नेंस” की बात फिर से केंद्र बिंदु होगी वहीं अगले चुनाव me राजद और जद यू को अस्तित्व बचाने की चुनौती शुरू हो गई है।
0 कांग्रेस के लिए दतिया की ‘राहत’ और भविष्य की चुनौतियां
दूसरी तरफ, मध्य प्रदेश के दतिया में बीजेपी की अंतर्कलह और सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाकर अपनी सीट बचा लेना कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से एक बड़ी राहत की सांस है। लगातार मिल रही राजनीतिक चुनौतियों के बीच यह जीत पार्टी कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार कर सकती है। हालांकि, इस एक जीत के उत्साह में कांग्रेस अपनी जमीनी हकीकत को नजरअंदाज नहीं कर सकती। पार्टी नेतृत्व को गहराई से आत्ममंथन करना होगा कि गुजरात जैसे राज्य में, जहां उसका बीजेपी से सीधा और आमने-सामने का मुकाबला है, वहां वह मतदाताओं के बीच ‘मोदी मैजिक’ को भेदने में क्यों विफल हो रही है? वहीं, बिहार का परिदृश्य कांग्रेस के लिए और भी बड़ी चेतावनी है। जहां एक तरफ प्रशांत किशोर जैसे नए चेहरे मजबूती से उभर रहे हैं, वहीं कांग्रेस को यह गंभीरता से विचार करना होगा कि वह बिहार के जटिल जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों के बीच अपनी दशकों पहले खोई हुई सियासी जमीन और प्रासंगिकता को आखिर कैसे वापस हासिल करेगी।
0 उपचुनाव भले राष्ट्रीय परीक्षण न हों, पर चेतावनी गंभीर हैं
यह सच है कि कुछ सीटों के उपचुनाव किसी राष्ट्रीय जनादेश का अंतिम परीक्षण नहीं होते। लेकिन जब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के अपने गढ़ और सत्ताधारी राज्यों में ऐसी हार दर्ज होती है, तो इसके राजनीतिक संदेशों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
यह चुनाव नतीजा बीजेपी के लिए आत्ममंथन का समय है—कि क्या वह अपने कैडर और निष्ठावान समर्थकों को नजरअंदाज कर रही है? और क्या सिर्फ चुनावी रणनीति ही काफी है, जब पारंपरिक मतदाता ही उदासीन होकर घर बैठने लगे? बिहार और मध्य प्रदेश के इन रुझानों ने भारतीय राजनीति में एक नई बहस और नए समीकरणों की नींव रख दी है।
