कोरबा : नन्हे हाथी ‘काशी’ की धूमधाम से मनाई छठी, सात गांवों के ग्रामीणों ने किया नामकरण….

✍️ भागीरथी यादव

 

कोरबा। जंगल में हाथियों की मौजूदगी के बीच इंसान और वन्यजीवों के रिश्ते की एक खूबसूरत तस्वीर कोरबा जिले के करतला वन परिक्षेत्र से सामने आई है। यहां नौ हाथियों के झुंड में जन्मे नन्हे हाथी के स्वागत में सात गांवों के ग्रामीण एकजुट हुए। रविवार को ग्रामीणों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ उसकी छठी मनाई और प्यार से उसका नाम ‘काशी’ रखा।

यह अनूठा आयोजन काशीपानी जंगल स्थित कारीपानी मंदिर के नीचे गौठान टिकरापारा में हुआ। इसमें रामभाठा, लबेद, पाहराभांठा, काशीपानी, छातापाठ, जामपानी और छुईडुंगा गांव के ग्रामीण बड़ी संख्या में शामिल हुए। मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन और पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद उपस्थित ग्रामीणों के लिए सामूहिक भोजन की व्यवस्था भी की गई।

 

परंपरा के साथ वन्यजीवों के प्रति बढ़ रहा अपनापन

 

नन्हे हाथी की छठी मनाने की शुरुआत धिनारा गांव से हुई थी। धीरे-धीरे यह परंपरा आसपास के गांवों तक पहुंची और अब ग्रामीण हाथियों के प्रति संवेदनशीलता और अपनापन दिखा रहे हैं। हाथियों को जंगल का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हुए उनके साथ सह-अस्तित्व की भावना को बढ़ावा देने की यह पहल क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है।

 

कोरबा जिले में 48 हाथियों की मौजूदगी

 

वन विभाग के अनुसार, करतला रेंज के काशीपानी जंगल में नौ हाथियों का झुंड विचरण कर रहा है। वहीं, कुदमुरा रेंज में 32 और चचिया क्षेत्र में सात हाथियों की मौजूदगी बताई गई है। इस तरह जिले में कुल 48 हाथी अलग-अलग क्षेत्रों में घूम रहे हैं। हाल के दिनों में हाथियों ने 17 किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचाया है, जिससे ग्रामीणों की चिंता भी बढ़ी है।

 

दो दशक से हाथियों का पुराना ठिकाना है यह जंगल

 

स्थानीय ग्रामीणों के मुताबिक, करीब 20 वर्षों से हाथियों का आना-जाना इस जंगल में लगा हुआ है। हाथियों के झुंड यहां लंबे समय तक ठहरते हैं और फिर दूसरे इलाकों की ओर चले जाते हैं। यह क्षेत्र हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्ग यानी कॉरिडोर का हिस्सा माना जाता है।

 

वन विभाग ने सतर्क रहने की दी सलाह

 

वन विभाग के एसडीओ मणिकांत वर्मा ने ग्रामीणों से हाथियों के नजदीक नहीं जाने, उन्हें परेशान नहीं करने और सुरक्षित दूरी बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने बताया कि हाथियों के कारण फसलों को हुए नुकसान के मामलों में नियमानुसार मुआवजा दिया जाता है। साथ ही, जनहानि रोकने के लिए ग्रामीणों को सतर्क रहने और हाथियों की गतिविधियों की जानकारी वन विभाग को देने की जरूरत है।

 

वर्ष 2000 में पहली बार पहुंचे थे हाथी

 

बताया जाता है कि वर्ष 2000 में पहली बार कुदमुरा रेंज के आमटिकरा गांव में हाथियों की मौजूदगी दर्ज की गई थी। इसके बाद जिले में हाथियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती गई। एक समय ऐसा भी रहा, जब कोरबा जिले में हाथियों की संख्या करीब 150 तक पहुंच गई थी। ऐसे में नन्हे हाथी ‘काशी’ की छठी का आयोजन वन्यजीवों के प्रति ग्रामीणों के बदलते नजरिए और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर रहने की भावना को दर्शाता है।