इंटक विवाद पर दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को लेकर बयानबाजी तेज, प्रतिवादी-5 ने दावों को बताया भ्रामक

✍️ भागीरथी यादव

 

 

“कोर्ट ने नहीं दी कोई अंतिम मान्यता, केवल पुनः समीक्षा का निर्देश”—ददई गुट का दावा, LPA दायर करने की तैयारी

नई दिल्ली, 29 अप्रैल 2026।

इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक) के भीतर चल रहे लंबे समय से विवाद ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। दिल्ली उच्च न्यायालय के 23 अप्रैल 2026 के आदेश को लेकर अब अलग-अलग गुटों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है।

प्रतिवादी संख्या 5 (इंटक ददई गुट) ने आधिकारिक बयान जारी कर स्पष्ट किया है कि वाद संख्या W.P.(C) 447/2017 — Indian National Trade Union Congress बनाम Union of India & Others — में माननीय न्यायालय ने याचिकाकर्ता के पक्ष में कोई अंतिम राहत या वैधानिक मान्यता प्रदान नहीं की है।

बयान में कहा गया है कि अदालत ने केवल भारत सरकार और संबंधित प्राधिकरण को 4 जनवरी 2017 के पत्र की पुनः समीक्षा कर विधि अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया है। यह आदेश किसी भी पक्ष के दावे को अंतिम रूप से स्वीकार या खारिज नहीं करता।

प्रतिवादी गुट ने यह भी रेखांकित किया कि न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के 10 जनवरी 2020 के आदेश पर कोई टिप्पणी नहीं की है। साथ ही, अदालत ने अपने आदेश में इंटक के भीतर चल रहे आंतरिक विवाद और नेतृत्व को लेकर लंबित मामलों का भी उल्लेख किया है।

वेरिफिकेशन और लंबित मामले बने विवाद की जड़

बयान के अनुसार, वर्ष 2007 के बाद केंद्रीय श्रमिक संगठनों का कोई सत्यापन नहीं हुआ है, जबकि यह प्रक्रिया 2016 में पूरी होनी थी। मेंबरशिप वेरिफिकेशन से जुड़ा मामला W.P.(C) 2837/2016 अभी भी न्यायालय में लंबित है।

इसके अलावा, इंटक के आंतरिक विवाद और मान्यता को लेकर सिविल सूट (Original Side) 384/2019 — Indian National Trade Union Congress बनाम जी. संजीवा रेड्डी — भी अभी लंबित है, जिसकी अगली सुनवाई जुलाई में प्रस्तावित है।

“जीत का दावा करना भ्रामक”

प्रतिवादी संख्या 5 ने याचिकाकर्ता पर निशाना साधते हुए कहा कि अदालत के आदेश को अपनी जीत के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यों का गलत और भ्रामक चित्रण है। संगठन की वैधता और प्रतिनिधित्व का निर्धारण केवल सक्षम प्राधिकरण और वैधानिक सत्यापन प्रक्रिया के माध्यम से ही हो सकता है।

LPA दायर करने की तैयारी

ददई गुट ने संकेत दिया है कि वह आने वाले दिनों में इस मामले में LPA (लेटर्स पेटेंट अपील) दायर करेगा और संगठन पर किसी भी प्रकार के “एकाधिकार” के प्रयास का कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध जारी रखेगा।

बयान में यह भी कहा गया कि उनका गुट शुरू से ही श्रमिक हितों, संगठन की संवैधानिक मर्यादा और विधि के शासन के पक्ष में खड़ा रहा है और आगे भी रहेगा।