दवाओं की लूट: सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और सरकार की चुप्पी

✍️ भागीरथी यादव

 

 

 

।।मनोज यू शर्मा।।

 

*मरता मरीज, मुनाफा कमाता बाजार,*

*सोता कानून, और लुटता लाचार।*

 

 

सुप्रीम कोर्ट ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के उस कड़वे सच को एक बार फिर उजागर किया है, जिसे हर आम इंसान रोज सहता है। अदालत के समक्ष पेश किए गए चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की जिस दवा का खुदरा मूल्य करीब 3,000 रुपये है, वही दवा लाचार मरीजों को 27,000 रुपये में बेची जा रही है। इस पर नाराजगी जताते हुए जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने तीखे सवाल खड़े किए कि आखिर दवाओं पर मुनाफे का एक समान 16 प्रतिशत का मानदंड क्यों नहीं लागू किया जा सकता? आवश्यक और गैर-आवश्यक दवाओं के नाम पर यह भेदभाव क्यों जारी है? इसके साथ ही अदालत ने कॉरपोरेट अस्पतालों द्वारा मरीजों को अपनी ही इन-हाउस फार्मेसी से दवा खरीदने के लिए मजबूर करने और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का पैसा महंगे दामों के कारण सीधे कंपनियों की जेब में जाने पर भी कड़ा रुख अपनाया है।

 

0 उपकरण और कंज्यूमेबल्स में सिंडिकेट का खेल

 

दवाओं की यह मनमानी सिर्फ गोलियों और सिरप तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे मेडिकल सिस्टम में फैली हुई है। कुछ समय पहले महाराष्ट्र के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे ने मेडिकल डिवाइस और कंज्यूमेबल्स में चल रही इसी संगठित लूट को बेनकाब किया था। उनके खुलासे के अनुसार, महज 11 रुपये की लागत वाला आईवी ड्रिप सेट मरीज को 325 रुपये में थमाया जा रहा है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि सिस्टम एक ही ढर्रे पर चल रहा है—चाहे दवा हो या चिकित्सा उपकरण, मरीज की बेबसी ही इस पूरे व्यापार के मुनाफे का सबसे बड़ा जरिया बन चुकी है।

 

0 कानूनी अधिकार, अदालती प्रक्रिया और प्रशासनिक ढिलाई

 

भारतीय पेटेंट एक्ट के तहत सरकार को यह स्पष्ट अधिकार दिया गया है कि वह जनहित में जीवनरक्षक दवाओं का सस्ता विकल्प खुद बनाकर या अन्य कंपनियों से बनवाकर जनता को उपलब्ध कराए। हाल ही में केरल हाईकोर्ट ने भी यह साफ किया था कि सरकार पेटेंटेड दवाओं का गैर-व्यावसायिक उपयोग कर सकती है। लेकिन जमीनी हकीकत इस नीतिगत ढिलाई की भयावह तस्वीर पेश करती है। सस्ती दवा की गुहार लगाने वाली कैंसर पीड़िता की याचिका पर अदालत में 57 बार सुनवाई टली और जब तक मामले पर निर्णय की नौबत आई, तब तक मरीज दुनिया छोड़ चुकी थी। अदालतें सवाल पूछ रही हैं और अधिकारी सोशल मीडिया पर सच उजागर कर रहे हैं, लेकिन निर्णय लेने वाली मेजों से इच्छाशक्ति पूरी तरह नदारद है।

 

0 बेकाबू बाजार और पंगु नीतियां

 

ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) और नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) के दायरे से अधिकांश आवश्यक दवाएं बाहर हैं। इसका सीधा नतीजा यह है कि किसी गंभीर बीमारी का इलाज कराते-कराते मध्यमवर्गीय और गरीब परिवार अपना घर-बार तक बेचने को मजबूर हो जाते हैं। सरकारी मंचों से शिक्षा और स्वास्थ्य को सर्वोपरि मानने के नारे चाहे जितने दोहराए जाएं, लेकिन जब सस्ती दवा और सुलभ इलाज सुनिश्चित करने की बात आती है, तो कॉरपोरेट लॉबिंग और प्रशासनिक बहानेबाज़ी हर जनहितैषी कदम पर हावी हो जाती हैं।

 

0 ठोस नीतिगत सुधारों की तत्काल आवश्यकता

 

अब सरकार के लिए केवल स्पष्टीकरण देने का समय बीत चुका है, बल्कि उसे तुरंत कड़े और ठोस कदम उठाने की जरूरत है। सरकार को सभी दवाओं और चिकित्सा उपकरणों के लिए एक पारदर्शी और सीमित प्रॉफिट मार्जिन तय करना होगा। जीवनरक्षक दवाओं को मूल्य नियंत्रण से बाहर रखने के लचर तर्कों को छोड़कर अनिवार्य लाइसेंसिंग के तहत सस्ती जेनेरिक दवाएं बनाने की व्यवस्था को सक्रिय करना होगा। यदि यह कड़े कदम अभी नहीं उठाए गए, तो सुप्रीम कोर्ट की चेतावनियां केवल अखबारों की सुर्खियां बनकर रह जाएंगी और मरीज यूं ही दम तोड़ते रहेंगे। स्वास्थ्य कोई विलासिता नहीं बल्कि संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार है, और इसे लंबे समय तक महज मुनाफे की मशीन नहीं बनाया जा सकता।

 

*मरीज मरें, दवा महंगी रहे…*

*ये कैसा इंसाफ है,*

*हुजूर ये कैसी रहनुमाई है?*